।।पिता का आशीर्वाद।।
।।पिता का आशीर्वाद।।
पिता का आशीर्वाद –
एक जीवनदायिनी गाथा
(एक सत्य कथा पर आधारित प्रेरणात्मक साहित्यिक प्रस्तुति)
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भूमिका:-
जीवन की सच्ची संपत्ति क्या है? धन, वैभव, व्यापार… या किसी वृद्ध पिता का वह कांपता हुआ हाथ, जो सिर पर आशीर्वाद रखता है?
जब सांसें डूबने लगती हैं, तब वह पिता अपने संचित अनुभवों की अमूल्य थाती पुत्र को सौंपता है – न स्वर्ण, न संपत्ति… बस सच्चाई, ईमानदारी, और एक निःस्वार्थ आशीर्वाद। प्रस्तुत कथा एक ऐसे ही पुत्र की है, जो पिता की तपस्वी वाणी को जीवन की दिशा बना बैठा, और फिर...
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कहानी एक पिता पुत्र की:
एक नगर में एक साधारण, किंतु अत्यंत सम्मानित व्यापारी अंतिम शैय्या पर लेटा था। साँसें डगमगा रही थीं, पर नेत्रों में तेज था। कमरे में धीमी रोशनी और मौन फैला हुआ था – उस मौन में उसने अपने इकलौते पुत्र "तेजपाल" को पास बुलाया।
"बेटा," वृद्ध पिता ने धीमे स्वर में कहा, "मेरे पास तुम्हें देने को न कोठी है, न हीरे-जवाहरात, न धन दौलत। पर एक पूंजी है जो मैंने जीवनभर सहेजी है – ईमानदारी और प्रामाणिकता। यही मेरा आशीर्वाद है। जीवन में सुखी रहोगे, और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जाएगी।"
तेजपाल ने नत मस्तक होकर पिता के चरणों को स्पर्श किया। पिता ने कांपते हाथों से उसके सिर पर हाथ रखा और सदा के लिए आंखें मूंद लीं।
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नवोदय:
अब घर की जिम्मेदारी तेजपाल के कंधों पर थी। पर पिता की वाणी उसके रोम-रोम में बस चुकी थी। उसने एक छोटी सी ठेला-गाड़ी से व्यापार शुरू किया। सुबह से शाम तक पसीना बहाता, पर मन में पिता का आशीर्वाद ही प्रेरणा बनकर जलता रहा।
धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाई। ठेले से दुकान बनी, दुकान से गोदाम, और कुछ ही वर्षों में वह नगर के प्रमुख व्यापारियों में गिना जाने लगा। पर तेजपाल की जुबां पर एक ही बात रहती – "यह सब मेरे पिताजी के आशीर्वाद का प्रताप है।"
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विवेक की कसौटी:
एक दिन उसके मित्र ने व्यंग्य से पूछा, "अगर तेरे पिता के आशीर्वाद में इतनी शक्ति थी, तो वह खुद क्यों न सफल हुए? क्यों जीवनभर संघर्ष करते रहे?"
तेजपाल मुस्कराया, "मैं उनके बल की नहीं, उनके आशीर्वाद की बात कर रहा हूँ। जिसने जीवनभर सत्य निभाया, उसका एक शब्द ब्रह्मवाक्य बन जाता है।"
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आशीर्वाद की परीक्षा:
समय बीतता गया। तेजपाल का व्यापार देश-विदेश में फैल चुका था। हर जगह लाभ, हर सौदे में सफलता। अचानक एक दिन उसके मन में आया – क्यों न हानि का अनुभव भी किया जाए? कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझ में गुरूर भर गया हो ?
उसने एक पुराने मित्र से पूछा – "ऐसा कौन सा व्यापार है जिसमें मुझे नुकसान हो सकता है?"
मित्र ने मन ही मन सोचा – "इसका घमंड चूर करना होगा…" और उसने सुझाव दिया – भारत से लौंग खरीदो और उसे जंजीबार (जहां लौंग की भरमार है) में जाकर बेचो।
तेजपाल ने बिना एक पल गंवाए वह व्यापार स्वीकार कर लिया। भारत में लौंग खरीदी, जहाज में भरकर स्वयं जंजीबार पहुँचा गया।
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भाग्य का रहस्य:
जंजीबार में उतरते ही वह एक लंबा रेतीला मार्ग पार कर रहा था, जब सामने से सुल्तान अपने सैनिकों संग आता दिखाई दिया। सौजन्यवश बातचीत हुई। तेजपाल ने बताया कि वह भारत का व्यापारी है और लौंग बेचने आया है।
सुल्तान हँस पड़ा – "यह लौंग का देश है! तुम क्या बेचोगे यहाँ? किसने यह सलाह दी?"
तेजपाल शांत स्वर में बोला – "मैं बस अपने पिता के आशीर्वाद की परीक्षा लेना चाहता हूँ।"
तभी उसकी नजर गई सुल्तान के सैनिकों
की तरफ जिन्होंने तलवारें नहीं, हाथों में छलनियाँ लिये हुए थे।
"इसका क्या कारण?" तेजपाल ने पूछा।
सुल्तान बोला, "मेरी उंगली से एक अंगूठी गिर गई है – वह फकीर का आशीर्वाद है, और मेरे लिए सल्तनत से भी अधिक मूल्यवान। उसी को खोजने के लिए रेत छानी जा रही है।"
यह सुन तेजपाल झुका, रेत की एक मुट्ठी उठाई, और जब उंगलियों के बीच से रेत छनी… तो सबकी आंखें चौंधिया गईं – वह अंगूठी उसी के मुट्ठी में थी।
आशीर्वाद का उत्तर
सुल्तान विस्मित रह गया – "ये चमत्कार है!" उसने कहा – "मांगो सेठ, जो भी चाहो मांग सकते हो।"
तेजपाल ने झुककर कहा – "आपकी प्रजा सुखी रहे, आप दीर्घायु हों – बस यही कामना है।"
सुल्तान ने उसे गले से लगा लिया – "तुम सच्चे तेजपाल हो! तुम्हारा सारा माल मैं मुंहमांगी कीमत पर खरीदता हूँ।"
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उपसंहार
आज तेजपाल को सब
"पिता का आशीर्वाद" कहकर पुकारते हैं। वह गर्व से मुस्कराता है – "काश, मैं उनके आशीर्वाद के योग्य बन सकूं… यही मेरी सबसे बड़ी कामना है।"
क्योंकि...
"पिता की दी हुई पूंजी स्वर्ण नहीं होती,
पर जो भी मिले, वह अमूल्य होती है।
जिसके सिर पर उनके आशीर्वाद का साया हो, उसे रेत में भी रत्न मिल ही जाते हैं।"
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संदेश
माता-पिता का स्नेह और आशीर्वाद – यही हमारी असली जड़ें हैं।
उनका अपमान करने वाला कभी ऊँचा नहीं उठता,
और जो उन्हें दिल से पूजता है,
उसकी तकदीर स्वयं उसका सम्मान करती है।
आओ, हम सब अपने माता-पिता
की सेवा में
ईश्वर की सेवा देखें।
यही सच्ची श्रद्धा है।
यही शाश्वत सत्य।
जिस वृक्ष की जड़ें गहरी और मजबूत होती हैं, वही आँधियों में भी अडिग खड़ा रहता है। ठीक वैसे ही, हमारे जीवन की नींव हमारे माता-पिता होते हैं – उनका त्याग, उनका प्रेम, और उनका असीम आशीर्वाद ही हमें हर कठिनाई से लड़ने की शक्ति देता है।
जो संतान अपने माता-पिता के चरणों में स्वर्ग का अनुभव करती है, उसके लिए संसार की कोई भी ऊँचाई असंभव नहीं रहती।
लेकिन जो उनके सम्मान और सेवा से विमुख होता है, वह चाहे जितना भी ऊपर चढ़ जाए, भीतर से खोखला रह जाता है, और अंततः समय की कसौटी पर टिक नहीं पाता।
माता-पिता की सेवा करना केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि ईश्वर की पूजा का सर्वोत्तम रूप है।
जिस घर में उनके चरणों को आदर मिलता है, वहाँ लक्ष्मी स्वयं स्थायी निवास करती हैं।
उनकी बातों में अनुभव का गहना है, और उनके आशीर्वाद में भाग्य बदलने की अद्भुत शक्ति।
यही सच्ची श्रद्धा है, यही धर्म है, यही वह शाश्वत सत्य है, जो युगों-युगों से अमिट है।
समाज में, संस्कृति में, और आत्मा के प्रत्येक कोने में यही संदेश गूंजता है –
"जिनके कारण हमने सांस ली, उनके लिए सांस लेना भी पूजा बन जाए।"
माता-पिता केवल शरीर नहीं, वे जीवन की पहली प्रार्थना हैं।
वे हमारी पहली आवाज़ हैं, पहला आशीर्वाद, पहला स्पर्श, और पहला संबल। उनकी आंखों में हमारे भविष्य की चिंता, उनके हाथों में हमारे बचपन की सुरक्षा और उनके हृदय में हमारी हर पीड़ा की दवा छिपी होती है।
आओ, हम इस सच्चाई को हृदय से स्वीकारें।।
आओं मिल कर हम सभी अपने माता पिता को नमन करें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें, वर्ष में एक बार उनको ईश्वर रुपी रूप देकर उनकी पूजा करें और उनकी लंबी आयु की कामना करें और ईश्वर से यही कामना करें कि उनका आशीर्वाद हमें हमेशा प्राप्त होता रहें।।
🙏धन्यवाद 🙏
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
विरमगांव, गुजरात।
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