जीवन एक संघर्ष एक सचाई
जीवन एक संघर्ष एक सचाई
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समोसे का स्वाद
वह रोज़ उसी फुटपाथ पर बैठा मिलता था—
सामने बिखरे अख़बार और कागज़ के लिफ़ाफ़े, जिनके पीछे शायद उसकी नन्ही हथेलियों की मेहनत छुपी थी। उम्र मुश्किल से बारह-तेरह साल की होगी, पर आँखों में एक गहरी परिपक्वता झलकती थी। चेहरा मासूम था, व्यवहार इतना सहज कि पहली ही बार में एक अजीब-सा अपनापन महसूस हो जाता।
मैं अकसर उसके पास जाकर रुक जाता। कभी अख़बार खरीद लेता, कभी बिना ज़रूरत के लिफ़ाफ़े। माँ को हैरानी होती—“इतने लिफ़ाफ़े क्या करोगे?”
लेकिन मैं कुछ नहीं कहता। कैसे कहता कि उन लिफ़ाफ़ों में मुझे जीवन की सच्चाई का स्पर्श मिलता है?
एक दिन मन हुआ कि अपने लिए समोसे के साथ उसके लिए भी एक ले लूँ। मैंने दो समोसे लिए और धीरे धीरे उसकी ओर बढ़ने लगा, मन में हजारों सवाल उठने लगे। उससे क्या कहूं कैसे समझाऊं की मुझ से वो समोसे ले ले। मैंने हर रोज की तरह उससे मुस्कुराते हुए उसका हाल चाल पूछा, उसने भी बड़े प्यार से मेरी ओर देखते हुए ज़बाब दिया, "बाबूजी सब ठीक है"। मगर उसके ज़बाब में एक दर्द छुपा था। मैंने धीरे से उसके आगे समोसा बड़ा दिया।
उसने हिचकिचाते हुए समोसा हाथ में लिया, धीरे-धीरे खाने लगा। स्वाद का आनंद उसके चेहरे पर तैर उठा, पर उसी क्षण आँखों में नमी उतर आई।
मैंने हँसते हुए पूछा—“क्या हुआ? मिर्च ज़्यादा है क्या?”
वह बस मुस्कुरा दिया। पैसे देने की कोशिश की, पर मैंने डाँटकर रोक दिया। उसकी कृतज्ञ निगाहें आज भी मेरे दिल में जैसे उत्कीर्ण हैं।
दिन यूँ ही बीतते रहे। पर एक दिन वह नहीं दिखा। बेचैनी बढ़ी तो पास ही खिलौने बेचने वाले से मैं पूछ बैठा। उसने बताया—“उसका नाम राहुल है। पास की गली में रहता है।”
मैं अनायास ही उस गली की ओर बढ़ गया।
छोटा-सा एक कमरे का घर, दरवाज़ा आधा खुला। अंदर से एक महिला निकलीं। थकी आँखें, साधारण साड़ी, पर चेहरे पर अद्भुत संयम।
“जी कहिए।”
“राहुल का घर यही है न?”
“हाँ, आप कौन?”
“मैं अक्सर उससे मिलता हूँ। आज नज़र नहीं आया तो चिंता हो गई।”
वे कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं—“अंदर आइए।”
कमरे में राहुल बिस्तर पर लेटा था। पास में अधूरे लिफ़ाफ़े, गोंद और बिखरे अख़बार पड़े थे। चेहरा पीलापन लिए था। माँ ने बताया कि उसे तेज़ बुखार है और दवाएँ असर नहीं कर रहीं। मैंने तुरंत डॉक्टर को फोन किया और दवाइयाँ मँगवाईं। माँ मेरे पैरों पर झुकने लगीं, पर मैंने रोक दिया। उनकी आँखों में आँसुओं का सैलाब उमड़ आया।
धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कहानी सुनाई। पति का देहांत कुछ साल पहले हो गया था। तबसे माँ-बेटा मिलकर लिफ़ाफ़े बनाते और बेचते थे। माँ ने दसवीं तक पढ़ाई की थी और अब राहुल को खुद पढ़ाती थीं। वह ‘ओपन स्कूल’ से हाईस्कूल की तैयारी कर रहा था।
“उसे पढ़ाई का बहुत शौक है,” उन्होंने गर्व से कहा, “कहता है, बड़ा होकर मास्टर बनूँगा। किताबें बाँटूँगा उन बच्चों को, जिनके पास पैसे नहीं हैं।”
मैं चुपचाप राहुल को देख रहा था। वह हल्की-सी मुस्कान के साथ मेरी ओर देख रहा था, जैसे कह रहा हो—“चिंता मत करो, मैं ठीक हो जाऊँगा।”
फिर उसकी माँ ने धीरे से कहा—“जानते हैं, उस दिन आपने उसे समोसा दिया था न? वह घटना मेरे लिए बहुत बड़ी थी। उसके पापा जब ज़िंदा थे तो हर महीने एक बार उसके लिए समोसा ज़रूर लाते थे। उनके जाने के बाद उसने समोसा खाना ही छोड़ दिया। उस दिन पहली बार उसने फिर से खाया… और इसलिए उसकी आँखें भर आईं।”
मैं भीतर तक हिल गया। एक साधारण-सा समोसा—जो मेरे लिए बस चटपटा नाश्ता था—उसके लिए स्मृतियों का पुल था, पिता की यादों का, और शायद जीवन की खोई हुई मिठास का भी।
उस छोटे से कमरे में टूटी खाट, बिखरे कागज़ और दवा की गंध थी। पर उसी के बीच मैंने पहली बार असली आत्मनिर्भरता और सम्मान देखा। निर्धनता और कठिनाइयों के बीच भी राहुल और उसकी माँ ने हार नहीं मानी थी।
मैंने सीखा कि जीवन में सबसे बड़ी पूँजी पैसा नहीं, बल्कि हिम्मत और आत्मसम्मान है।
राहुल ने मुझे समझाया कि छोटे-से छोटे क्षण—एक मुस्कान, एक समोसा, एक दोस्ती—भी किसी के जीवन का सहारा बन सकते हैं।
उस दिन लौटते हुए मेरे हाथ खाली थे, पर दिल भरा हुआ था—दुख, कष्ट, और सुकून—तीनों रंगों में रंगा हुआ।
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👉 यह लघुकथा अब केवल एक मुलाक़ात की कहानी नहीं, बल्कि जीवन का दर्पण है—जहाँ निर्धनता में भी इज़्ज़त की लौ जलती है और कठिनाइयों के बीच भी उम्मीद अंकुरित होती है।
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना
लेखक :- स्वाप्न कवि काव्यांश "यथार्थ"
विरमगांव, गुजरात।
