जनक- एक मार्गदर्शक
जनक- एक मार्गदर्शक
लेख शीर्षक: "पिता – एक मौन समर्पण और संतान का उत्तरदायित्व"
(एक भावनात्मक, रचनात्मक, प्रेरणात्मक और विचारोत्तेजक साहित्यिक लेख)
प्रस्तुत लेख में हमने हमारे परम पूज्यनीय पिताश्री को आधार मानकर उनके प्रति दो शब्द लिखने प्रयास किया हैं।
प्रस्तुत शब्दों में उन चरणों की वंदना की हैं, जिन्होंने हमेशा काँटों पर चलकर हमारे लिए फूलों की राहें बुनीं है।।
जिनकी हथेलियों की लकीरों में हमारे सपनों की दिशा बनी,
और जिनकी आंखों में छिपा था वह समर्पण,
जिसे शब्दों में बाँध पाना शायद असम्भव है।
पिता........
वो नाम नहीं, एक जीवंत प्रतीक हैं- त्याग, धैर्य और अडिग संकल्प का।
धूप कितनी भी तेज़ क्यों न हो, वे अपने आँचल की तरह फैले अस्तित्व से हमारे लिए छाया बन जाते हैं।
उनकी उपस्थिति कोई उत्सव नहीं, बल्कि एक सतत कर्मयोग है—
जो बिना किसी चाह के, सिर्फ हमारे भविष्य की नींव में खुद को समर्पित करता रहा।
जब जीवन की राहों पर अंधेरा होता है, तो उनके निर्णय, उनके अनुभव, दीपक बनकर दिशा दिखाते हैं।
जब कभी हिम्मत डगमगाने लगती है, तो उनके मौन आशीर्वाद में एक अपराजेय शक्ति मिलती है।
उन्हें किसी तुलना की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वे स्वयं एक मानक हैं— ब्रह्मांड जितना विस्तृत, और आत्मा जितना गहन।
एक पिता अपने बच्चों के लिए जीवनभर एक मार्गदर्शक, संरक्षक और आधार स्तंभ होता है। वह अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए समर्पित कर देता है। ऐसे में बच्चों का अपने पिता के प्रति कुछ महत्वपूर्ण कर्तव्य और जिम्मेदारियाँ होती हैं, जिन्हें समझना और निभाना प्रत्येक संतान का नैतिक, सामाजिक और भावनात्मक कर्तव्य होता है। नीचे इन्हीं विषयों को बड़ी गहराई से विभाजित कर समझाने का प्रयास किया गया है :-
🧭 1. सम्मान और श्रद्धा देना
- पिता को सम्मान देना बच्चों का प्रथम और मुख्य कर्तव्य है।
- चाहे वह शिक्षित हों या नहीं, धनी हों या साधारण — उन्होंने अपने सामर्थ्य से बच्चों का पालन किया।
- वृद्धावस्था में विशेषकर उनके आत्मसम्मान की रक्षा करना संतान का धर्म है।
उदाहरण: वृद्ध पिता के झुके कंधों को बोझ न समझकर, उनके अनुभव को जीवन की सबसे बड़ी पूँजी समझना।
💞 2. प्रेम और भावनात्मक सहयोग देना
- अक्सर पिता अपने भावों को छिपाते हैं, लेकिन उन्हें भी बच्चों के स्नेह की आवश्यकता होती है।
- उनके साथ बैठना, हालचाल पूछना, बातें करना — यह उनके लिए सबसे बड़ी संतान-संपत्ति है।
उदाहरण: एक व्यस्त बेटा भी हर दिन दो मिनट कॉल कर "कैसे हो पापा?" पूछे तो वह जीवनभर याद रखा जाता है।
🧓 3. देखभाल और सेवा करना (विशेषकर वृद्धावस्था में)
- जैसे पिता ने बाल्यकाल में संतान की देखभाल की, वैसे ही बुढ़ापे में बच्चे की जिम्मेदारी बनती है कि वह उनके स्वास्थ्य, आराम और सुरक्षा का ध्यान रखें।
- दवाइयाँ, चश्मा, सुनने की मशीन — ये सब जरूरतें तब सम्मान से पूरी हों जब वह खुद कहने में संकोच करें।
🏡 4. परिवार और विरासत की गरिमा बनाए रखना
- बच्चों का कर्तव्य होता है कि वे अपने पिता की बनाई सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विरासत को बनाए रखें।
- परिवार की प्रतिष्ठा, संस्कार, परंपराएँ — यह सब पिता के अधूरे स्वप्न होते हैं जिन्हें आगे बढ़ाना संतान की जिम्मेदारी है।
💰 5. आर्थिक सहयोग देना (जब आवश्यक हो)
- कई बार पिता आर्थिक रूप से असहाय हो जाते हैं।
- उस अवस्था में उन्हें बोझ नहीं समझना चाहिए बल्कि गर्व से उनकी ज़रूरतें पूरी करनी चाहिए।
ध्यान रहे: यह दान नहीं, कर्तव्य है।
📜 6. निर्णयों में सलाह और सहभागिता देना
- बच्चे अगर अपने जीवन के निर्णयों में पिता से राय लें, उन्हें विश्वास में लें — तो इससे उन्हें मानसिक संबल और आत्मिक शांति मिलती है।
- यह उन्हें यह अहसास कराता है कि वे अब भी परिवार में महत्वपूर्ण हैं।
📚 7. सीखों और अनुभवों का आदर करना
- पिता जीवनभर के अनुभवों का खजाना होते हैं।
- उनकी बातों को नजरअंदाज करने के बजाय, सीख की तरह ग्रहण करना चाहिए।
- उनकी गलतियों से भी सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए, ना कि उन्हें ताना देना।
📿 8. पितृऋण चुकाना (धार्मिक व नैतिक दृष्टिकोण)
- हिन्दू संस्कृति में "पितृऋण" माना गया है — यानी पिता के प्रति ऋण।
- इसे सेवा, श्रद्धा, वंश वृद्धि, और उनके स्वप्नों को पूरा करके चुकाया जाता है।
- उनके निधन के बाद तर्पण, श्राद्ध जैसे कर्म भी इसी ऋण को चुकाने की प्रक्रिया माने जाते हैं।
---
भूमिका:
वह कभी छाँव बनकर सिर पर हाथ रखता है,
कभी हवा बनकर कठिनाइयों को अपने ऊपर ले लेता है।
वह कभी मुस्कुरा कर जीना सिखाता है,
तो कभी आँसू पीकर संतान की मुस्कान बचा लेता है।
वह है — "पिता",
एक ऐसा शब्द जो गूंजता नहीं, मगर जीवनभर साथ चलता है।
---
पिता – मौन तपस्वी:
माँ की ममता तो दिख जाती है, पर पिता का प्रेम अक्सर मौन होता है।
वह अपने जज़्बातों को शब्दों की जगह कर्म में बदलता है।
सुबह की पहली किरण के साथ घर से निकल जाना,
दिनभर की भागदौड़,
थके हुए कंधे और धूप में जले हुए चेहरे के बावजूद
शाम को मुस्कुरा कर दरवाज़ा खोलना — यही उसका प्रेम है।
पिता कभी अपने हिस्से का फल नहीं खाता,
वह चुपचाप वह टुकड़ा बच्चों की थाली में रख देता है
जो सबसे मीठा होता है।
---
बचपन में पिता की छाया:
बचपन में जब संतान गिरती है, तो माँ दौड़ती है,
पर पीछे से एक मजबूत बाँह उसे थामती है — वह पिता है।
पहली साइकिल चलाने में जब पैर काँपते हैं,
तो कोई पीछे से सहारा देता है — वह पिता है।
बच्चे के पहले शब्दों से लेकर पहले स्कूल तक,
पहली फीस से लेकर पहली हार तक —
हर मोड़ पर वह खड़ा होता है,
चुपचाप, मगर पूरी ताक़त के साथ।
---
जीवन में पिता का संघर्ष:
कभी किसी ने गौर किया है —
जिस पिता ने अपने बच्चों को सर्दियों में गर्म कपड़े पहनाए,
वह खुद ठंड में पुरानी शॉल ओढ़कर सो गया।
जिसने बच्चों की फीस भरी, किताबें दिलाईं,
वह खुद कई बार अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को मार गया।
उसने कभी शिकायत नहीं की,
न ही कभी यह जताया कि वह थक गया है,
क्योंकि उसके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था —
बच्चे की तरक्की।
बच्चों की जिम्मेदारियाँ:
संतान होना केवल जन्म लेना नहीं होता,
वह एक उत्तरदायित्व है — एक कर्तव्य।
जब पिता बूढ़ा हो जाए,
उसके पैर काँपने लगें, आँखें धुंधली हो जाएँ,
तो बच्चों को चाहिए कि वे उसका हाथ पकड़ें,
वैसे ही जैसे उसने बचपन में उनका थामा था।
वृद्ध पिता को घर का कोना मत बनाओ,
उन्हें दिल का केंद्र बनाओ।
उनके अनुभवों को "पुराना ज्ञान" नहीं,
बल्कि "जीवन की सीख" समझो।
---
भावनात्मक संबंध – समय दो:
पिता को सबसे अधिक चाहिए होता है —
समय और सम्मान।
उनसे बातें करो, उन्हें सुनो,
उनकी कहानियाँ भले पुरानी लगें,
पर उनमें जीवन के सार छिपे होते हैं।
जिन बच्चों के पास सब कुछ होता है
पर पिता नहीं —
वो जान सकते हैं पिता की गैरमौजूदगी का अदृश्य दुःख।
---
जब पिता नहीं रहता:
एक दिन वह मौन पुरुष,
जिसने जीवनभर कुछ नहीं माँगा,
अचानक इस संसार से विदा ले लेता है।
तब उसके बग़ैर हर कोना खाली लगता है।
वह पुरानी घड़ी, वो कुर्सी, वो चश्मा, वो छड़ी —
हर चीज़ में उसकी याद बस जाती है।
उनके अंतिम संस्कार में रोना आसान है,
पर जीवित रहते उन्हें समय देना कठिन क्यों है?
---
निष्कर्ष – पितृऋण का निर्वाह:
"पितृऋण" केवल एक धार्मिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक जीवनधर्म है।
इस ऋण को केवल कर्मकांडों से नहीं,
बल्कि सेवा, सम्मान और साथ से चुकाना होता है।
हर संतान को चाहिए कि वह जीवनभर
अपने पिता के सपनों को संजोए,
उनकी इच्छाओं को पूरा करे,
और जब समय आए,
तो उनके पदचिह्नों पर चलकर
उनके नाम को गर्वित करे।
---
अंतिम पंक्तियाँ:
वह धूप में चलता रहा हमारे लिए,
हम बस एक छतरी भी न थमा सके।
जब थककर बैठ गया जीवन के द्वार पर,
हम अपने व्यस्त जीवन से झाँक भी न सके।
पिता कोई कहानी नहीं,
वह एक जीता-जागता व्रत है —
जिसे निभाना ही सच्चें संतान की पहचान है।
🔚 निष्कर्ष:
"पिता सिर्फ जन्मदाता नहीं होते, वे जीवनदाता होते हैं।"
उनकी अपेक्षाएँ अधिक नहीं होतीं — बस थोड़ी इज्ज़त, थोड़ी अपनापन और थोड़ी सी देखभाल।
बच्चों को चाहिए कि वे यह समझें कि पिता की भूमिका जितनी महान होती है,
उतनी ही महान उनके प्रति जिम्मेदारी निभाने का कार्य भी।
अंत में बस यही कहूँगा –
"पिता"
वो कविता हैं, जो कभी पूरी नहीं होती,
वो प्रार्थना हैं, जो हर दिन हमारे साथ होती है और वो आशीर्वाद हैं,
जो बिना माँगे भी हर क्षण बरसते हैं।
पिता जो जीवन के अंतिम समय तक हमारी यादों में समाएं रहते हैं एक शक्ति और आशीर्वाद बनकर।
पिता ही स्वर्ग है, पिता ही धर्म है
पिता ही देवों भव:।।
पिता को शत् शत् नमन।।
---
स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
विरमगांव, गुजरात।
