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कवि काव्यांश " यथार्थ "

Abstract Children Stories Tragedy Classics Fantasy Inspirational Others Children

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कवि काव्यांश " यथार्थ "

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अंतिम यात्रा

अंतिम यात्रा

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📖 शांति की तलाश: एक पिता की अंतिम यात्रा


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खंड 1: अदृश्य त्याग



गांव की कच्ची गलियों में जब सूरज अपनी पहली किरणों से धरती को थपकियाँ देता, तब एक वृद्ध अपनी छड़ी टेकता हुआ, चुपचाप तालाब की ओर निकल पड़ता।
सुबह की ताजी आवोहवा का आनन्द लेते हुए खुद को तरोताजा महसूस करते हैं।
 उनका नाम था – मास्टर गिरधारीलाल जी।


गांव में सब उन्हें 'गुरुजी' कह कर पुकारते  थे।  सफेद झबरी दाढ़ी, मैले मगर साफ कपड़े, और झुकी पीठ के बावजूद आंखों में एक गहराई थी – जैसे हर आंसू का इतिहास उन्होंने देखा हो।


गिरधारीलाल जी कभी सरकारी स्कूल में अध्यापक थे। सरलता, सच्चाई और सेवा उनकी जीवन-नीति थी। पत्नी सरस्वती के साथ उनका जीवन बहुत सादा मगर आत्मिक रूप से समृद्ध था।
उन्हें तीन बहुमूल्य पुत्र रत्न मिले – रमेश, सुरेश, और कमलेश। जीवन की सारी दौलत उन्होंने इन्हीं तीनों में लुटा दी।


पिता का वह रूप जिसे कोई नहीं देख पाता।


गिरधारीलाल जी जब स्कूल से आते तो तीनों बच्चों की पढ़ाई खुद करवाते। सरस्वती खाना बनातीं और वो एक-एक निवाले बच्चों को खिलाते। किसी बच्चे की एक खांसी भी हो जाए तो पूरी रात उनके माथे पर हाथ रखे जागते रहते। बच्चों की फीस भरने के लिए कई बार अपने कपड़े तक नहीं खरीदे। बर्तन बेच दिए, घड़ी गिरवी रखी, खेतों का एक हिस्सा तक बेच दिया – मगर बच्चों की किताबें न कभी पढ़ाई रोकीं ना रूकने दी।

कहते हैं न कि इस जीवन का कभी कोई भरोसा नहीं होता, कब कैसे कोई इस संसार को छोड़कर चला जाए ये कोई नहीं जानता। ऐसा ही कुछ गिरधारीलाल जी के साथ भी हुआ।


सरस्वती की असमय मृत्यु ने गिरधारी को भीतर तक तोड़ दिया। एक वही तो थीं जिनकी वजह से उनका जीवन एक सृमध्द जीवन बना। मगर बच्चों के लिए उन्होंने कभी आंसू तक नहीं बहाए – "वें दोनों बन गये, बाप भी और मां भी।"


बेटों की उड़ान


इधर जब बड़े हुए तो सभी ने अपनी अपनी पढ़ाई ठीक ठाक पूरी की।
रमेश इंजीनियर बन गया, सुरेश डॉक्टर और कमलेश प्रशासनिक सेवा में चयनित हुआ। तब गिरधारीलाल जी ने पूरे गांव में मिठाई बांटी, और खुद सूखी रोटी खाकर मंदिर में जाकर ईश्वर को धन्यवाद दिया। बेटों को शहर भेजा – अपनी कमाई से नहीं, बल्कि उधारी लेकर, उन्होंने अपने पिता होने का कर्तव्य बाखूबी निभाया।


धीरे-धीरे बेटे उड़े, और फिर... लौटे नहीं।


पिता का अकेलापन ।।

वो समय भी आया जब तीनों बेटों ने अपनी अपनी तरक्की के लिए अपना घर छोड़ दिया और अपने संसार में व्यस्त हो गए।

पिता गिरधारीलाल जी जो अब अकेले थे, बिल्कुल एंकात। घर सूना सूना, दीवारों पर बच्चों की वो पुरानी तस्वीरें टंगी थी – जिनमें वो खुद चप्पल पहनाना सिखा रहे थे, चलना सिखा रहे थे, हंस खेल रहे थे, बच्चों को अपनी गोदी में लेकर कुछ समझा रहे थे। बेटों के लिए वो तस्वीरें बेशक 'बीते दिनों' की यादें थीं, पर गिरधारी के लिए तो उनका 'ये जीवन' था।

हर त्यौहार पर वो दरवाज़े की चौखट को निहारते रहते, बस एक उम्मीद एक आस लगाए – शायद कोई बेटा याद करते हुए उनके पास आ जाए।

जब भी फोन करते, तो जवाब मिलता –
 "पापा, आज मैं जरा मीटिंग में हूं", "अभी बिज़ी हूं", "बाद में आपसे बात करता हूं ठीक है।"


गांव में एक कच्ची पक्की पाठशाला थी जहां वो अकसर बच्चों को कहानियां सुनाया करते थे, ज्ञान की बातें और माता पिता के प्रति वफादारी और कर्तव्य निष्ठा को बड़े प्यार से समझाया करते थे।

गांव वालों की आंखें नम हो जाया करती थीं, जब भी वो लाठी पकड़े, अकेले मंदिर में बैठे रहते और जीवन की उन सुनहरे यादों में खोए रहते। उनके जीवन का अंतिम साथी था – हरिनारायण जी, जो उनके स्कूल के समय के पुराना सहपाठी और पड़ोसी भी थें।


शब्दों से परे मौन का बोझ


समय बिताता गया और देखते ही देखते वर्षों बीत गए किन्तु अभी तक तीनों में से कोई भी बेटा उनसे मिलने न आया। कैसे किस हाल में हैं ये भी जानने की कोशिश  नहीं की। अब तो फोन भी आने कम हो गए।

 गिरधारीलाल अब धीरे धीरे बीमार रहने लगे थे। खाना भी कम खाते, बातें भी कम करते। कमरे में बैठकर पुराने खतों कों पढ़ते रहते – जो बेटों द्वारा कभी-कभी  भेजे गए कार्ड्स, जिन पर लिखा होता था – “We miss you, Papa.”


हरिनारायण ने कई बार कहा – “गिरधारी, चल मेरे साथ शहर, बच्चों के पास‌ घूम आते हैं, तुम्हारा मन भी बहल जाएगा और मन को शांति भी मिल जाएगी।” पर वो मुस्करा देते और कहते – “अब इस देह को मिट्टी यहीं मिलनी है, भाई, अब क्या जाना कहीं पे जब सरस्वती की यादें यहां बसी हो तो।”

एक शाम, जब आसमान बादलों से घिरें थें और चारों ओर घनघोर अंधकार छा गया था, जोरों से हवायें चलने लगी थी और आंगन में तुलसी के पत्ते लहरा रहे थे – जिसमें अकसर उनकी पत्नी सरस्वती जल चढ़ाकर पूजा किया करती थी, अपने एंकात में उसकी सिर्फ यादें ही थी जो सदैव उनके साथ रही। जब भी सरस्वती की यादें उन्हें सताती थी गिरधारीलाल जी की आंखें अपने आप ही नम हो जाया करती थी। उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ जब गिरधारीलाल जी अपनी खाट पर लेटे थे तो ऐसा प्रतीत हुआ कि जैसे किसी ने उनके बालों को छुआ और प्यार से सहलाते हुए कुछ कह रहीं हो कि बस अब और कोई दुःख नहीं और कोई कष्ट नहीं जीवन का सही अर्थ आपने समझ ही लिया, ईश्वर ने आपको बहुत कुछ दिया उनका शुक्रिया अदा करें। बस इतना ही कहना था कि बहार जोरों से वर्षा आरंभ हो गई और फिर गिरधारीलाल जी के आंखें आंशुओं से छलकने लगे और न जाने कब वो यूं ही चुपचाप पड़े-पड़े सदा के लिए शांत हो गए और इस दुनिया को अलविदा कह गए, किसी को बिना बताए, बिना किसी को तकलीफ़ दिए। अपना दुःख अपना दर्द अपने साथ लेकर। हजारों शिकायतें जो इस जग से थी, अपने संतानों से थीं उन्हें भी अपने साथ कहीं दफना गए। अंतिम समय में ना कोई साथ रहा, ना कोई आया। इसका दुख उन्हें वर्षों तलक‌ सताता रहा।
उन्होंने जैसे जीवन जिया, वैसे ही मृत्यु को भी गले लगाया – शांत, मौन, और त्याग से परिपूर्ण।


सुबह जब हरिनारायणजी आयें, तो देखा – गिरधारीलाल की आंखें बंद थीं और ऐसे लग रहा था जैसे किसी गहरी नींद में सो रहे हो और उनके होंठों पर एक अजीब सी शांति थी और हल्की सी मुस्कुराहट भी– जैसे इंतज़ार ख़त्म हो गया हो। उन्होंने उन्हें जगाने की बहुत कोशिश की मगर असफल रहे। तब उन्होंने जोर से उन्हें झकझोरा, " अरे गिरधारीलाल उठों देखों कितना सवेरा हो गया है।" तभी उनका एक हाथ धीरे धीरे उनके शरीर से एक तरफ छीठक गया,
उनके हाथ में एक पर्चा था – जिस पर लिखा था:

 "हरिनारायण, अगर मेरे बेटे न आएं तो कोई ग़म न करना, ऐसे में तुम ही मेरे सब कुछ हो ये समझना। अपना पूरा अधिकार मैं तुम्हें सौंपता हूं। माफ कर देना मेरे दोस्त– उन्हें नहीं, मुझे, कि कब मेरा अंतिम समय आएगा और मुझे तुमसे सदा के लिए दूर ले जायेगा। ये किसको पता। अपने बच्चों को 
मैंने प्यार करना तो सिखा पाया, मगर कभी कर्तव्य नहीं समझा पाया।"




हरिनारायण की आंखें भर आईं और जोर जोर से रोने लगे।  बाहर सूरज चढ़ चुका था, पर भीतर कहीं अंधेरा पसर गया था।


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खंड 2: परायों में अपनों की तलाश


दूरियों की आवाज़


गांव में जैसे ही खबर फैली कि गुरुजी अब नहीं रहे, गांव के लोग एक-एक करके उनके घर आने लगे। कोई उनके चरणों में बैठ कर तो कोई उनके पास बैठ कर रोनें लगा , कोई खिड़की से टकटकी लगाए बस उन्हें देख रहे थें।

किसी ने कहा, “ऐसे लोग युगों में एक ही पैदा होते हैं, अब तो घर में भी सन्नाटा है और हमारे गांव में भी।”


हरिनारायण ने तीनों बेटों को फोन किया।


पहले रमेश को – "बेटा, तुम्हारे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं रहे।"

उस पार से चुप्पी… फिर एक ठंडी सांस लेकर – "कब हुआ ये अंकल? मैं अभी मीटिंग में हूं, टिकट देखता हूं जल्द ही आने की कोशिश करूंगा।"

सुरेश ने कहा – "मैं तो विदेश में हूं अंकल, अभी तो आने में टाइम लगेगा।"


कमलेश बोला – "सरकारी ड्यूटी है अंकल, मैं भेजता हूं किसी को।"


हरिनारायण ने सिर थाम लिया।


इस संसार में ऐसे बेटे भी होते हैं भला, ऐसे बेटों का क्या काम?


शव पर भी विवाद


तीनों बेटे गांव आए – लेकिन अलग-अलग गाड़ियों में, अलग-अलग टाइम पर। किसी के चेहरे पर दुख नहीं, बस एक औपचारिक रूप से उदासी। जैसे किसी अधूरे दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने आए हों।

अब सवाल उठा – अंतिम संस्कार कौन करेगा?
तीनों एक दूसरें को ताकने लगे।

रमेश बोला, “मैं बड़ा हूं, मैं करूंगा।”

कमलेश चीखा, “बड़े तो हो, पर पिता से मिलने कब आए थे?”

सुरेश बोला, “बात मत बढ़ाओ, मैं विदेश से आया हूं, पैसे मैं भेज रहा था हर महीने।”

तीनों ही आपस में उलझ गए लेकिन कोई भी अंतिम संस्कार की बात नहीं कर रहा था। बात इतनी बढ़ी कि संपत्ति के अधिकार में आकर रूक गई।

सभी गांव वाले देखते रह गए – तीन बेटे, और एक शव – और उस पर संपत्ति के अधिकार की लड़ाई ।

हरिनारायण ने डांटा, "शबाश बच्चों, शबाना,  शर्म करो! जिस देह ने तुम्हें जन्म दिया, जीवन भर तुम लोगों के लिए जिया, आज उसके साथ ऐसी भाषा ऐसे विचार? क्या किसी पिता से बढ़कर धन‌दौलत या संपत्ति हो सकती है भला ?”


जब पराया बन गया अपना


गांव के बुजुर्ग खामोशी से देख रहे थे। हरिनारायण ने सबको हटाया। फिर अपने हाथों से गिरधारीलाल की देह को गंगाजल से स्नान करवाया, सफेद कफ़न में लपेटा।

कंधा देने कोई भी बेटा आगे नहीं आया।


हरिनारायण ने चार गांववालों को बुलाया – “हम देंगे कंधा। उनका नहीं, उनके जीवन के हर पल को।

श्मशान घाट तक वह खुद लेकर गया। रामनाम सत्य की गूंज में भी हरि की आंखें नम थीं। अग्नि दी, और वहीं बैठ कर तब तक जपा जब तक चिता बुझ न गई।

विलक्षण भोज और विनाश की पुकार।।


तीनों बेटे तो लौट गए श्मशान से अपने गांव के घर में– किसी ने न रुकना चाहा, न कंधा दिया, न कोई क्रिया कर्म।

हरिनारायण ने अपने पैसों से तेरहवीं का भोज करवाया। गांव के हर आदमी को बुलाया। उसने कहा:

"ये भोज किसी शरीर के लिए नहीं, एक आत्मा के लिए है जो अपनों के बीच भी पराया बन गई थी।"


गांव वालों की आंखों में गुस्सा था – "ऐसी संतानें तो श्राप हैं। एक पिता को मरने पर भी शांति न मिले, तो इससे बड़ा पाप क्या होगा भला?"


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खंड 3: आत्मा की पुकार



रात्रि थी। गांव की सीमाएँ गहरी निस्तब्धता में डूबी हुई थीं। जहां कोई आवाज़ नहीं थी, वहां एक अदृश्य कंपन था — जैसे समय कुछ कहना चाहता हो, जैसे वायु कुछ बुन रही हो।

पिता गिरधारीलाल का पार्थिव शरीर अब पंचतत्व में विलीन हो चुका था, लेकिन उसकी आत्मा...?
नहीं, वह शांत नहीं थी।


अलौकिक चुप्पी में आवाज़


बटुक चाचा उस रात गिरधारीलाल की चिता की राख लेने गए। पर जब उन्होंने राख उठाई, तो उनकी आंखों के सामने सहसा एक अद्भुत दृश्य कौंधा — जैसे एक छाया-सी उनके समक्ष खड़ी हो, धुएं की शक्ल में, और जैसे उसके होंठ कांपते हुए कुछ कह रहे हों।


"बटुक… मेरे बच्चों से कह देना… मैंने क्षमा कर दिया है उन्हें… पर मेरी आत्मा अटकी है… कहीं… अधूरी…"

बटुक चौंक गए। राख उनके हाथ से छिटक गई। उन्होंने चारों ओर देखा — पर वहां कोई न था।

फिर अचानक, मंदिर की घण्टियाँ अपने-आप बज उठीं।


सपनों में प्रवेश


उस रात गांव बड़ी अजीब घटना घटी वो भी सपनों के रूप में देखी गई — रमेश, सुरेश और कमलेश … जो गिरधारीलाल जी के तीनों पुत्र थें । तीनों ने एक जैसा ही दृश्य देखा नींद में, एक ही जैसा दृश्य…

सपना -

 "किसी ने न छुआ… किसी ने न पुकारा…
मैं तड़पता रहा… मैं भटकता रहा…
क्या पिता होना एक अपराध है…?"




तीनों बेटों की नींद एक साथ टूटी, पसीने में लथपथ। पर किसी ने भी सुबह तक इस स्वप्न का ज़िक्र नहीं किया… शायद डर था, शायद ग्लानि…

भटकती आत्मा के संकेत


अब गांव में अजीब घटनाएँ घटने लगीं।

मंदिर में जलता हुआ दिया, हर सुबह बुझा मिलता हैं — और मंदिर अपने आप ही बंद हो जात था।


गिरधारीलाल के घर की छत पर देर रात कोई छाया चलती हुई प्रतीत होती थी, पर जब देखा जाता, कुछ न मिलता।


छोटे बच्चों ने कहना शुरू किया — "दादाजी आकर हमें कहानी सुनाते हैं… पर माँ कहती हैं वो तो मर गए… तो फिर कौन हैं वो?"


गांव की पुरानी दाई, रानी बाई, एक दिन जोर जोर से रो पड़ी। उसने कहा,

"मैंने उस रात गिरधारीलाल को देखा था… चिता से उठते हुए… मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकतीं… वो कुछ कह रहे थे… पर उनका मुँह राख से ढँका था…"



ब्रह्मर्षि का आगमन


एक दिन एक अपरिचित वृद्ध संन्यासी गांव आए। कोई नहीं जानता कि वे कौन हैं, कहाँ से आए। उन्होंने गांव में प्रवेश करते ही पूछा:

"इस गांव में एक आत्मा रो रही है… कौन है जो चिता से भी मुक्त न हो सका?"



पंचायत ने उन्हें पूरी बात बताई। संन्यासी ने नेत्र मूँद लिए… और फिर बोले:


"उस पिता की आत्मा इसलिए नहीं मुक्त हो सकी… क्योंकि ‘स्नेह’ जो उसे बाँधता था, वह ‘स्वीकृति’ नहीं बन पाया।  जब संतानें पिता को अपना कहेंगी… तभी वह आत्मा मुक्त हो पाएगी। पर एक बात और… वो आत्मा सिर्फ शांति नहीं चाहती… वह संकेत दे रही है… पुनर्जन्म का।" 

गांव स्तब्ध। यह कैसा पुनर्जन्म?


जन्म लेने को तैयार एक आत्मा।


उसी समय, गांव की एक युवती – सीमा, जो पूरे गांव में बाँझ मानी जाती थी, सारा गांव यही मानता था कि सीमा कभी मां नहीं बन सकती क्योंकि विवाह के १२ वर्ष पछचात भी अभी तक वह मां नहीं बन पाई थी और अचानक गर्भवती हो गई थी। ये पूरे गांव के लिए आश्चर्य चकित करने वाली घटना थी।

डॉक्टर भी चकित थे। मेडिकल रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा था — "असंभव गर्भधारण" — और अब १ महीने की गर्भवती।


गांव वालों ने इसे चमत्कार कहा। सीमा ने रात को सपना देखा —


 "एक वृद्ध व्यक्ति उनके सिर पर हाथ रखकर कह रहे हैं —
अब मैं आ रहा हूँ… पर इस बार मुझे सिखाना… कि सच्चा बेटा कैसा होता है।’"



संकेत स्पष्ट हो गया था


बटुक चाचा ने उस संन्यासी से पूछा,
क्या गिरधारीलाल जी अब फिर से जन्म लेंगे?”
संन्यासी ने मुस्कराकर कहा:


 “कुछ आत्माएँ मृत्यु से नहीं डरतीं। वे वापस आती हैं — सुधारने, सिखाने और चेताने देने के लिए।
ये पुनर्जन्म नहीं… ये पुनः प्रयोजन है।”





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स्वरचित, मौलिक, अप्रकाशित रचना लेखक :- कवि काव्यांश "यथार्थ"
              विरमगांव, गुजरात।
















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