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Minni Mishra

Abstract


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Minni Mishra

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धरा

धरा

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 " यदि तुम बेदर्द होकर अपना साम्राज्य फैलाना जानते हो, तो सावधान हो जाओ! अब तुम्हारी एक नहीं चलेगी। चुपचाप उसे देखो, जो मैं करने जा रही हूँ!" 

"क्या करोगी तुम? हे अबला नारी!" उसका अहंकार बोल पड़ा। 

" अबला हूँ या सबला ! ?अभी तुम्हें पता चल जाएगा। आकाश से पृथ्वी तक तुम्हारे पसरे साम्राज्य को मैं पल भर में उखाड़ फेकूँगी। आज तक 'त्याग की नारी' का झूठा तगमा पहनाकर, तुम मुझे फुसलाने की कोशिश करते आये हो ,इसे मैं अब अच्छी तरह समझने लगी हूँ।

 अरे...अहसान फरामोश ! मैंने तुम्हें अपने रक्त से सींचा है, अपना स्तनपान कराया ! पर, ना तुमने रक्त का मान रखा और ना ही स्तनपान का! आततायियों का संहार करने के लिए ही तुम्हें लायक बनाया था ! पर, संहार करने के बदले अत्याधुनिक बनने के चक्कर में तुमने उसी आततायियों से साँठ गाँठ कर ली! आकाश से पृथ्वी तक अपना एकाधिकार जमा लिया।

 ओह! ये क्या किया ?! तूने जननी को अपने हाथों मृत्यु शैय्या पर सुला दिया! देख, मेरी दुर्दशा! ना हरियाली बची ,ना नदियाँ और ना ही पक्षियों का कलरव! चारों ओर वीरानी व्याप्त है! अब ये मेरे बर्दाश्त से बाहर है। 

जान ले, मैं भी आधुनिक नारी हूँ। रो, बिलखकर अपना जीवन बर्बाद करने में विश्वास नहीं रखती। इसलिए, तू अब मेरा नया स्वरूप देख , हा..हा...हा...हा....." धरा के मुँह से तेज आग की लपट निकलने लगी और आँखों से रक्त का धार । जैसे ही अपने हाथ में खड़ग लिए उसने हुँकार भरना शुरू किया , दसों दिशाएँ थर्रा उठा। अट्टहास के वेग से गगनचुंबी इमारतें ध्वस्त हो गईं । सड़क, रेलवे, हवाई अड्डे आदि..सभी क्षत विक्षत हो गए। आँखों से निकले रक्त के सैलाब से पृथ्वी रक्त रंजित दिखने लगा ।

 धरा का यह रणचंडी रुप देख संपूर्ण ब्रह्मांड में हड़कंप मच गया। नभ में सभी देवता करबद्ध खड़े होकर समवेत स्वर से विनती करने लगे । जिसे देखते ही मचा बवंडर हठात् थम गया। वातावरण सुरभित हो उठा। पक्षियों के कलरव सुनाई देने लगे। चहुँ ओर झरने से कलकल की आवाज गूंजने लगी।

 इस अद्भुत पराक्रम को देख, धरा का पुत्र... 'मोडर्न सांइस' अचंभित, उसके आगे घुटने टेक बिलखने लगा," माँ, अब क्षमा करो ...!" 

संहारक रूप ममतामयी स्वरूप में पुनः साकार हो उठा । जिगर के टुकड़े को गले से लगाते हुए वह बोली, " बेटा, तुम विध्वंसक नहीं, प्रकृति के सृजन हार बनो। प्रकृति सही सलामत रहेगी तभी हम जीवित रह सकते हैं। 

"लो, पकड़ो इसे, कर्मपथ के रास्ते में आये सभी आततायियों को इससे संहार कर डालो। " अपना खड़ग बेटे को पकड़ाते हुए धरा अंतर्ध्यान हो गई। आक्रांत प्रकृति के चेहरे पर मुस्कान लौट आई ।

 


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