Vijaykant Verma

Abstract


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Vijaykant Verma

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डियर डायरी

डियर डायरी

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Dear Diary 25 मार्च 2020 पूरे भारत में कोरोना के कारण लॉक डाउन। घर से बाहर निकलने पर रोक। लेकिन यह सवाल सिर्फ खुद की सुरक्षा का नहीं, बल्कि पूरे देश की सुरक्षा का है। इसलिए सरकार के इस आदेश का पालन करना हम सभी का नैतिक कर्तव्य है। मैंने भी अपने आप को घर में बंद कर दिया है। वैसे जनता कर्फ्यू तो 22 तारीख से ही लागू है। और उस दिन मैंने अपने एक मित्र के यहां जाना था, लेकिन उधर से मुझे व्हाट्सएप पर मैसेज मिला, क्या कि आज ना आइएगा, क्योंकि कोरोना की भयावहता को देखकर पूरे देश में जनता कर्फ्यू का ऐलान किया गया है। मुझे अच्छा लगा यह मैसेज पढ़कर, कि लोग जागरूक है अपने कर्तव्य के प्रति और अपने देश के प्रति। फिर मुझे खबर मिली कि 22 तारीख को रेलवे ने सारी गाड़ियां भी कैंसिल कर दी है। कहते हैं कि "जान है तो जहान है..!" और यह बिल्कुल सच बात है। इंसान की जिंदगी बहुत कीमती होती है। पहले परिवार, फिर समाज फिर देश और फिर विश्व। जिस तरह से बूंद बूंद कर सागर भरता है, उसी तरह एक एक इंसान मिलकर इस संसार की रचना करते है। मतलब यह संसार हमसे ही है। और अगर देखा जाए तो यह बात कितनी महत्वपूर्ण है और कितने सम्मान की बात है हम सबके लिए..! इसलिए हम सब का यह परम कर्तव्य है कि हम खुद को बचाएं, घर में ही रहें, सुरक्षित रहें, क्योंकि हमारे बचने से ही हमारा देश बचेगा। लेकिन "खाली दिमाग शैतान का घर..!" इस कहावत का भी हमारे जीवन में बहुत महत्व है। इसलिए हम सभी को किसी न किसी काम में खुद को व्यस्त रखना भी बहुत जरूरी है। मुझे पढ़ने लिखने का बहुत शौक है। अक्सर अपने खाली समय में छोटी छोटी कविताएं और कहानियां पढ़ता रहता हूँ । और जब भी मस्तिष्क में कोई नए विचार आते हैं तो लेखन करने बैठ जाता हूँ । मेरी इस शौक ने मुझे बहुत कुछ दिया है। मान सम्मान और पैसा भी। मैं बता नहीं सकता, कि मुझे उस दिन कितनी खुशी हुई थी, जब मेरी पहली रचना मुंबई से प्रकाशित फिल्म पत्रिका "माधुरी" में छपी थी। वह एक पैरोडी रचना थी, "मेरी चिंता तुम न करना, मैं मज़े में हूँ..! खत बराबर लिखते रहना मैं मजे में हूँ ..!!" 1976 मैं प्रकाशित इस रचना पर मुझे ₹25 का पारिश्रमिक भी मिला था। इसके बाद फिर और भी कई रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में मेरी प्रकाशित हुई। इनमें से बहुत सी रचनाएं इधर-उधर हो गई, जबकि कुछ अखबारी रचनाएं तो रद्दी में भी बिक गई, जिनका मेरे पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं है..! मैंने आज इनमें से कुछ बची रचनाओं को ढूंढ कर उनका संग्रह किया और इसी में मेरा बहुत समय बीत गया। मैंने सोचा है कि इस लॉक डाउन के समय मे इन बची हुई रचनाओं की एक अलग फाइल बनाऊँगा। और अपनी इन रचनाओं से संदर्भित एक डायरी भी अलग से मेंटेन करूंगा।फिलहाल रात का समय है। खाने में आज अपनी मनपसंद आलू की पूड़ी मैंने खाया है। नींद ने मुझे आवाज दे दी है। शुभरात्रि। ए जिंदगी तू जरा संभल के रह! कोरोना से खुद को बचा के रह!!


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