यशोधरा
यशोधरा
पंद्रह वर्ष पूर्ण पीहर में,
अब सावन सासुराल के थे।
शाक्य कुल की वधू बनी मेरे अहोभञ थे।
यशोधरा के सौभाग्य पे नियति मुसकाई थी,
सखियों ने भी सिद्धार्थ की प्रशंसा फुसफुसाई थी।
सिद्धार्थ के लक्षण सदैव और राजाओं से भिन्न थे।
शास्त्र - राज्य पाठ से दूर वे सदा शांति के करीब थे।
देते सम्मान खूब मुझे देते मान प्यार थे,
मानते अर्धांगिनी को लक्ष्मी
ऐसे उच्च विचार थे।
ससुराल में प्रेम की धारा बहती,
पर राजा रानी भी एक ही चिंता में रहती थी,
हुई थी भविष्यवाणी सिद्धार्थ बनेगा संत महान या राजा महान केहलाएग
सदा चिंतित राजा रानी वो ना जाने वे किस पथ पर जाएंगे।
उम्मीद थी सिद्धार्थ से श्री राम सा
जो राम राज्य बसाएं गे।
क्या पता था, वे सीता सा त्याग जाएंगे।
महलों के राजकुमार को किसी उत्तर की खोज थी।
सुविधाए उनके लिए जैसे कोई बोज थी।
दुख से व्याकुल हो दुखों का कारण धुड़ने निकले थे,
रात के अंधेरे में को सब त्याग निकले थे।
आंख खुलते ही चक्षुं से अश्रु टप टप गिरते थे।
बता ना सके कारण मुझे क्या इतना ही विश्वास करते थे।
मुझसे करते ये सवाल तो उनका विराह उनका दुख का कारण कहती,
कैसी अपेक्षा थी तुम्हारी की मै चुप चाप सब सेहती।
देखे जग भर के दुख तुमने बखूबी थे,
कैसे कर्तव्यों को यूं अनदेखा करते काश मुझे भी सिखा देते।
ना सीता दमयंती सा पति धरम निभाने की मुझे आज्ञा थी।
अकेले पालना था तुम्हारे अंश को
नियति की शायद यहीं आशा थी।
स्त्रियों का मान सम्मान करना तुम्हारे उदहारण से सिखाऊंगी।
पत्नी ना सही तो माता का धर्म
निभाउंगी।
पर एक शिक्षा मा नहीं एक स्त्री बन
सिखाऊंगी,
मन जो तुम्हारा तो आवश्य ही तुम संसार का उद्धार करना
कभी नयायप्रिया राजा तो, कभी सन्यासी बना,
पर पत्नी को छोड़ने का दुख
कभी ना अपने सर लेना।
सिर्फ 7 वचनों के कारण नहीं दिल से भी प्यार देना।
संसार या समाज के लिए कभी ना उस अकेला करना,
भले ना देना स्वर्ण महल
पर कुटिया में भी सम्मान देना।
अपनी अर्धांगिनी को सदैव सबसे उनका स्थान देना।
सवाल थे हजरों पुत्र के कहां पिता हैं
कहां है विरासत उनकी,
कहां मेरा प्यार है?
क्यों मेरा ही अधूरा संसार है ?
फिर हर सवाल की में उत्तरदाई थी
फिर हिचिकते हुए सिर्फ खामोशी मुख पर छाई थी।
विरासत में गौतम के संसार भर का ज्ञान था।
पर क्या तुम्हारे सात वचनों में मेरा मान सम्मान था।
मन की अवश्य मंशा थीं कि
राहुल में पिता की छवि हो,
कैसे उसपे जीवन ना समर्पित करती जो जीने की इकलौती आशा हो।
वर्षों के गए सिद्धार्थ, बुद्ध बन लौट आए थे,
वर्षों पुराने गम फिर दिल के किवाड़ खटखटाए थे।
पर रेहगई चुप जब बुद्ध मुस्कुराए थे।
पुत्र में पिता से मिलने की उत्सुकता भरपूर थी,
अनजान थी मै नियति क्रूर थी।
आखिकार राहुल भी सन्यास के पथ पर चलना चाहता था
वो भी घर का आंगन छोड़ बाहर उत्तर खोजना चाहता था।
दे ना सके प्रियतम का साथ
अभी ही बात भुलाई थी,फिर पुरुष ने स्त्री से स्वार्थ सिद्धि हेतु
त्याग की इच्छा जताई थी।
पूछ लेते माँ से क्या पुत्र सौंपने को तायार थी ?
तुम्हारे एक ही निर्णय से हारी बार बार थी।
इतिहसकारों के मुख से तुम्हारे त्याग की कहानी सुनाई जाएगी
फिर मेरे दर्द दुख को यह दुनिया भूले गी।
मेरे विरह के क्षण यह दुनिया ना शब्दों में बांध पाएगी।
संसार भर का ज्ञान तुम अपने अंदर समा बैठे,
फिर मेरे दुख से रहे अनजान कैसे।
प्रबोधन प्राप्त किया तुमने मुझको त्यागकर,
संसार से उजाला तुमने किया,
अंधेरों में रात मैंने बिताई थी
कम था तुम्हारा विरह
जो राहुल से भी कड़ी टर्डवाई तुड़वाई थी।
पर मैंने क्या पाया तुम्हें ईश्वर मानकर।
समसंबुद्धों के नाम से तुम अमर रहोगे
पर यशोधरा सा दुख
कभी ना सहोगे।

