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डॉ. प्रदीप कुमार

Tragedy

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डॉ. प्रदीप कुमार

Tragedy

वंचित-वर्ग की वेदना

वंचित-वर्ग की वेदना

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ज़ोर-ज़बरदस्ती की ज़रूरत नहीं है, 

हम तुम्हारे इशारों पे चलते रहेंगे, 

तुम्हारे सम्मुख टिकने की हिम्मत नहीं है, 

जो भी कहोगे तुम, हम करते रहेंगे।

मान भी तुम्हारा, अभिमान भी तुम्हारा, 

कहाँ रहा अब स्वाभिमान हमारा?

भड़की जब-जब विरोध की चिंगारी, 

तुम जीते सदा, हार हुई हमारी।

सदियों से ये कुचक्र चल रहा, 

रोके ना इसका पहिया रुक रहा, 

लाख हम मांगे इससे आजादी, 

कोई कहाँ सुन रहा हमारी ?

ठोकर पे ठोकर पड़ रही है, 

हमारी कहीं भी नहीं चल रही है, 

घड़ा सब्र का भर तो गया है, 

पर तोड़ने से भी नहीं टूट रहा है।

अब कौन-सी विधि हम अपनाएं, 

कोई तो हमें वह तिथि बताए, 

जब सम्मान हमें हमारा मिलेगा, 

हम वंचितों को भी कुछ सहारा मिलेगा, 

मिटेगी कब यह विरह-वेदना? 

कब जागेगी तुम्हारी चेतना?


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