Click here to enter the darkness of a criminal mind. Use Coupon Code "GMSM100" & get Rs.100 OFF
Click here to enter the darkness of a criminal mind. Use Coupon Code "GMSM100" & get Rs.100 OFF

Krishna Sinha

Abstract Tragedy


4  

Krishna Sinha

Abstract Tragedy


दम मेरा अब घुटने लगा है

दम मेरा अब घुटने लगा है

1 min 229 1 min 229

कोई हटाओ इन पहरेदारों को,

की दम मेरा अब घुटने लगा है...

इस तनहाई के कैदखानों में,

चीख चीख के लफ्ज थकने लगा है ,

मयस्सर नहीं दीदार ए रौशनी

क्यों उम्मीदों का सूरज छिपने लगा है ,

नाज़ था बड़ा जिस वज़ूद पर अपने ,

वो ना जाने कहाँ खोने लगा है ...

कोई हटाओ इन पहरेदारों को,

की दम मेरा अब घुटने लगा है...

सीधी सी दिखती थी राह जो मंज़िल की,

कदम बढ़ाया, तो क्यों रास्ता धूमिल होने लगा है ....

कोई हटाओ इन पहरेदारों को,

की दम मेरा अब घुटने लगा है...

तस्सवुर में थी मासूम सी तस्वीर उसकी,

क्यों कूची में रंग सूखने लगा है ,

उतरने भी ना पायी कागज़ में सूरत ,

क्यों हाथों का हुनर खोने लगा है ...

कोई हटाओ इन पहरेदारों को,

की दम मेरा अब घुटने लगा है...



Rate this content
Log in

More hindi poem from Krishna Sinha

Similar hindi poem from Abstract