STORYMIRROR

डॉ. प्रदीप कुमार

Tragedy

4  

डॉ. प्रदीप कुमार

Tragedy

वक्त बदला, या हम?

वक्त बदला, या हम?

1 min
359

अब समय बदल गया? 

या फिर लोग बदल गए?

अब कोई गीत नहीं गाता, 

अब कोई लोरी नहीं सुनाता।

एक घर में ही कई घर बन गए हैं, 

सब दूर-दूर रहने लगे हैं, 

कोई किसी के पास नहीं जाता, 

शायद, बदलाव की बयार के संपर्क में सब आ गए हैं।

जिस दालान में बच्चों की महफ़िल सजा करती थी, उस दालान के चारों ओर 

अब ऊंची दीवार बन चुकी है, 

लोग बड़े हो चुके हैं, उस जगह को भूल चुके हैं, 

जहां उनको एक समय ढेरों खुशियां मिलती थीं, 

आज कोई रुक कर उसके भीतर नहीं झांकता।

जिंदगी अब किश्तों में कटने लगी है, 

कागज़ के कुछ टुकड़ों में सिमटने लगी है, 

इंसान की जान अब इंसानों में नहीं, 

बल्कि धन-दौलत में बसने लगी है।

हां, लोग ही बदल गए हैं, 

सब समझदार हो गए हैं, 

समय अब भी वही चार पहर का ही है, 

सूरज अब भी तय समय पर ही निकलता है, 

बदलाव का असर सब पर नहीं हुआ है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy