उसकी अनन्त दिनचर्या
उसकी अनन्त दिनचर्या
सूरज की प्रथम किरण खिलते ही
निकल पड़ता है घर से बगल में एक पोटली दबाये
फिर से काम की तलाश में
झुलसती गर्मी हो या चिलचिलाती धूप
कहर बरपाती बरसात हो या
हिमालय से चली बर्फीली सर्द हवाएँ
वो कभी रुकता नहीं, कभी थकता नहीं
क्योंकि जानता है परिवार की जिम्मेदारियाँ
दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ जो करना है
उनके लिए जो आशाओं की टकटकी लगाए बैठे हैं
वो इससे अनजान है कि
मुद्रास्फीति के गिरने और चढ़ने से
शेयर बाज़ार पर क्या प्रभाव पड़ता है
मगर ये ज़रूर समझता है कि
शेयर बाज़ार बेशक छू ले आसमान को
उसकी मुफलिसी में कोई बदलाव नहीं आने वाला
उसे आभास है इस बात का कि
नेताओं के खोखले वादे, फीकी मुस्कान
फाइलों में धूल फांकती सरकारी योजनाएँ
दयाशून्य समाज की खोखली सहानुभूति
उसकी आर्थिक स्थिति में शायद ही कोई बदलाव लाये
सिर्फ उसकी मेहनत, कर्म और
अनंत प्रयास ही उसका भाग्य बदल सकते हैं
लेकिन फिर भी वह गरीब क्यों है
क्यों उसके बच्चे रात को भूखे ही सो जाते हैं
वो आज फिर खाली हाथ घर लौटेगा
शायद उसे आज भी कोई काम नहीं मिला
फिर से निराशा के वही घने काले बादल
माथे पर अनिश्चितताओं की बलखाती लकीरें
क्या यही उसका भाग्य है
सूरज ढलने के बाद
जब वह घर लौटेगा तो
अपनी फीकी व् दिखावटी मुस्कान से
फिर से अपने भूखे बच्चों का
पेट भरेगा और बच्चे भी
मुस्कुराते हुए सो जाएंगे
जैसे उनकी भूख मिट गई है
मानो भली भांति परिचित हैं पिता की लाचारी से।
