उजालों के जुगनू
उजालों के जुगनू
हौले से रात का पर्दा सरका कर
उजालों के जुगनू,
भर लायी हूँ,
अपने आँचल में
और बिखेर दिये हैं,
तुम्हारी राह में !
जैसे वो बचपन में तुम,
जादू से
टाफीयाँ बिखेर देते थे
मेरी राह में !
पता है ! मंजिलों पर
पहुंचाने वाली राह,
आसान नहीं होती !
पर कितनी ही मुश्किल
क्यों न हो,
गर इन लकीरों से जुड़ा
तेरा हाथ है, तू साथ है !
तो एक दिन मंजिल,
खुद हमारे कदम चूमेगी !
