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Bhavna Thaker

Abstract Romance

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Bhavna Thaker

Abstract Romance

तुम्हें लिखती हूँ

तुम्हें लिखती हूँ

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"तुम वहाँ मैं यहाँ फिर भी अनुबंध ही तुमसे अनोखा है

मेरी कलम के सीने में धड़कता तुम्हारे नाम का झरोखा है"


तुम्हें सोचती हूँ, तुम्हें लिखती हूँ 

पहले से लेकर आख़री पन्नों पर तुम्हारा राज 

किसे है डर फासलों का..

 

शब्दश: तुम ही तुम मेरी हर रचना में बसते हो,

तुम शब्द हो तो मैं अर्थ हूँ..


किताब के भीतर दोनों की रूह झिलमिलाती हंसती है,

छंद, ताल, लय से बहती.. 


यूँ ही नहीं महकती मेरी रचनाएँ, ना गुलाब रखती हूँ

ना इत्र छिड़कती हूँ तुम्हारी चाहत की स्याही में डूबो कर

हर अल्फाज़ लिखती हूँ..


रुबरु की रंजिश नहीं बिना मिले ही मेरी मोहब्बत

तुम्हारे इश्क से आलिंगन करती है..


दो जिस्म की खुशबू है मेरी रचनाएँ 

सदियों तक बिखेरती रहेगी कायनात के हर ज़र्रे में महक अपनी,

जब जब पाठकों की ज़ुबाँ अक्षरशः पढ़ेगी.. 


हर रचनाएँ होंगी मेरी कल्पनाओं का आईना

बेशक जिसमें छवि हर पंक्ति पर तुम्हारी ही दिखेगी..



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