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Anjana Singh (Anju)

Abstract

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Anjana Singh (Anju)

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मन की खिड़की

मन की खिड़की

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अगर छूना है आसमान

और भरनी है ऊॅंची उड़ान

तुम मन की खिड़की तों खोलो

उड़कर गगन को छू लों


जब तुम खोलोंगे खिडकीं

तभी तो रोशनी पाओगें

बंद कमरें में यूं

घुट कर ही मर जाओगे


मौसम कैसा भी रहे

मन सुकून सा रहे

इसकें लिए तुम हरदम

उम्मीद की खिड़की खोलों


कभी-कभी दिल के दरवाजे पर

देता है कोई दस्तक

मन की खिड़की खोलकर

हो जा तू नतमस्तक


कभी जिंदगी के उदास लम्हों में

 मुस्कुरा कर कोई आ जाए

 जैसें बंद कमरें की खिड़की से

नई रौशनी सी आ जाए


अपने को पहचान जरा तू

अपनी शक्ति जान जरा तू

मन की खिड़की खोलकर

खुद ऊपर उठ जाओगे

आसमान छू जाओगे


कल का दिन किसने देखा है

सब कुछ यहीं रह जाएगा

अकेलापन को छोड़कर

मन की खिड़की खोलकर

जी भरकर हॅंस पाएगा

सब कुछ साफ नजर आयेगा।


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