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Anju Singh

Abstract

4.4  

Anju Singh

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मन की खिड़की

मन की खिड़की

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124


अगर छूना है आसमान

और भरनी है ऊॅंची उड़ान

तुम मन की खिड़की तों खोलो

उड़कर गगन को छू लों


जब तुम खोलोंगे खिडकीं

तभी तो रोशनी पाओगें

बंद कमरें में यूं

घुट कर ही मर जाओगे


मौसम कैसा भी रहे

मन सुकून सा रहे

इसकें लिए तुम हरदम

उम्मीद की खिड़की खोलों


कभी-कभी दिल के दरवाजे पर

देता है कोई दस्तक

मन की खिड़की खोलकर

हो जा तू नतमस्तक


कभी जिंदगी के उदास लम्हों में

 मुस्कुरा कर कोई आ जाए

 जैसें बंद कमरें की खिड़की से

नई रौशनी सी आ जाए


अपने को पहचान जरा तू

अपनी शक्ति जान जरा तू

मन की खिड़की खोलकर

खुद ऊपर उठ जाओगे

आसमान छू जाओगे


कल का दिन किसने देखा है

सब कुछ यहीं रह जाएगा

अकेलापन को छोड़कर

मन की खिड़की खोलकर

जी भरकर हॅंस पाएगा

सब कुछ साफ नजर आयेगा।


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