Unlock solutions to your love life challenges, from choosing the right partner to navigating deception and loneliness, with the book "Lust Love & Liberation ". Click here to get your copy!
Unlock solutions to your love life challenges, from choosing the right partner to navigating deception and loneliness, with the book "Lust Love & Liberation ". Click here to get your copy!

जितेन्द्र सिंह जीत

Abstract

4.5  

जितेन्द्र सिंह जीत

Abstract

कल्कि अवतार की बारी है

कल्कि अवतार की बारी है

1 min
630


प्रभु तेरे कलयुग की लीला

अद्भूत अगण निराली है

ज्ञानी का कोई मोल नहीं 

मूढ़ से मिलने मारामारी है 


काबिल के कारोबार ठप

चतुर की दुकानदारी है

शिक्षित बाहें बांध खड़े

और चलती ठेपामारी है 


कर्मठ अपने आप लगे

शेष को रोकना जारी है

विशेषों से काम लें कैसे

एजेंडा सरकारी है 


हाथ जोड़ घर-घर में घूमें

चुनावी लाचारी है

जीत गये तो घूमो पीछे 

दरस ना मिलने वाली है 


मर्यादा की सीमा हर दिन

जबरन तोड़ी जाती है

अपने हैं तो सॉरी ना बोलें

ग़ैरों पे मुकदमा सारी है


खूंखार खुलेआम सड़क पर

गाय की पहरेदारी है

लुटेरे परदेस में मस्त 

भीड़ की कड़ी निगरानी है


पुत्र की हर इच्छापूर्ति

पिता की जिम्मेवारी है

जिंदा रहते भार नामुमकिन 

याद में लंगर भारी है


जन्मजात रिश्तों की गाड़ी

कहाँ सदा चल पाती है

गठबंधन के बाद के नाते

लंबी चलने वाली है 


मेधावी को अंक मिले कम

टॉपर बना अनाड़ी है 

बेईमान ईमानी सबसे

भोला हीं भ्रष्टाचारी है


हाशिये पर खरा जो बोले

हावी चाटुकारी है 

ढोंगी के घर लोग अनेकों

छद्म वेश दुराचारी है 


श्री चरनन की पादुका

जहां भरत लिए सिर नाई रे

आज वहीं भाई का हिस्सा

हड़पे सगा हीं भाई है


हे गिरिधर ,मोहन ,बंशीधर

पाप की फ़िर बरियारी है

देवदत तेरी बाट निहारे

कल्कि अवतार की बारी है...!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract