STORYMIRROR

Lakshya Taneja

Abstract

4  

Lakshya Taneja

Abstract

रिश्तों की ड़ोर

रिश्तों की ड़ोर

1 min
232

मेरे हाथ से बंधी डोर कहीं टूट ना जाए 

जो लचक है धागे की वो रूठ ना जाए 


ना लगे पता किसी दिन के टूट गयी 

या किसी एक छोर से छूट गयी 


नहीं पता लगेगा किसने ज़ोर आज़माया या किसने ढील दी 

या किसी पैनी सतह ने वो डोर ही छील दी 


अगर टूट जाएगी तो समेट लूँगा 

सिर्फ अपने हाथ पर लपेट लूँगा 


ना कभी ज़िक्र करूँगा ना उस डोर की बात होगी 

पर एक बात से खुश होऊंगा के उसमे ना कोई गांठ होगी 


इसीलिये डोर पकड़ो पर ज़ोर से नहीं 

खींचो भी पर कमज़ोर छोर से नहीं।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract