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Lakshman Jha

Abstract

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Lakshman Jha

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स्वर्णिम भारत

स्वर्णिम भारत

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जिसने देश को स्वर्णिम

बनाने की कसम खायी थी !

संविधान के ग्रंथों में हाथ

रखके सपथ खायी थी।


"सबका साथ सबका विकास "

के नारे कानों में गूँजा करते थे !

"मेक इन इंडिया "और "आत्मनिर्भता"

के मंत्रों के धुनि रमाया करते थे।

चले थे सात समंदर पार देशों

से अपना कोई जुगाड़ लगायें !


क्या बात हो गयी अपने पड़ोसिओं से

जो आपके कोई काम ना आयें।

कोई पूछता हो आखिर महंगाई


बताओ कहाँ जा रही है ?

विश्व के कोने -कोने में देखो

यह विकराल महामारी फैल रही है।

आपके वादे ने हमें बहुत ही

एक -एक करके निराश किया !


देश की संपदाओं को चुन -चुन

फिरंगियों की तरह बेच दिया।

लोगों की नौकरियाँ चलीं गईं

युवाओं को काम कहाँ से देंगे ?


करेंगे जनमानस की अनदेखी

स्वर्णिम इतिहास कैसे रचेंगे ?


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