STORYMIRROR

Kislay Kumar

Abstract

3  

Kislay Kumar

Abstract

गम

गम

1 min
50

जितने तुम गम देते हो

उतने कहां मरहम देते हो


अब आते हो ,अब आओगे

अक्सर यार भरम देते हो


पीर खनकती है सासों में

जो तुम यार जख्म देते हो


हां जीते है जैसे -तैसे

ऐसे क्यों मौसम देते हो


पहलू से उठकर जाते हो

ऐसे क्यूं यार सितम देते हो।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract