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अंकित शर्मा (आज़ाद)

Romance Tragedy Others

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अंकित शर्मा (आज़ाद)

Romance Tragedy Others

तन्हा

तन्हा

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तुमसे ज्यादा खुद को

किसी को समझाया ही नहीं,

फिर भी अक्स मेरा

तुम्हें भाया ही नहीं।


बिखर गया है अब

हर तिनका मेरे घर का

और कहते हो तुम

तूफान कोई तुमने चलाया ही नहीं।


चीर देती है तल्खी तुम्हारी

दिल को भीतर से

और कहते हो तुम

मुझे तुमने रुलाया ही नहीं।


खामोश हो कर 

बड़ी जिरह मुझसे करते हो तुम

और कहते हो सवाल कोई तुमने

उठाया ही नहीं।


पत्थर सा हो गया हूं मैं

फिर भी समंदर सी हलचल है

नादानी से कहते हो कि 

कोहराम कोई मचाया ही नहीं।


डूबा रहता हूं मैं

अश्कों के उफानो में

तुम कहां जानते हो

मुद्दतों से मुस्कुराया ही नहीं।


चीख कर कह रही हैं आंखें

दर्द मेरे दिल का

और कहते हो तुम

मुझे कुछ बताया ही नहीं।


अब संग रहकर भी

तन्हा महसूस करता हूं

जब कहते हो तुम

मैं साथ आया ही नहीं।



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