STORYMIRROR

अंकित शर्मा (आज़ाद)

Abstract

4  

अंकित शर्मा (आज़ाद)

Abstract

शर्त

शर्त

1 min
1

लगता है उन्हें जैसे मुझे चला रहे हैं

देख लो ये लब मेरे अब भी मुस्कुरा रहे हैं,

मेरी मुस्कान इक अदद दर्द है जिनका

उन्हें दर्द और ज्यादा हम दिए जा रहे हैं


अपनी शर्तों पे जीवन जिए जा रहे हैं,

गुरूर बस इतना हम खुद पे किए जा रहे है,

बस बात इतनी साबित करने की खातिर,

कुछ बदलाव शर्तों में किए जा रहे हैं।


वो सोचते हैं ये, हमसे खेलेंगे वो,

हम बता दे उन्हें , नियम तय हमने किए,

जो बात हम बोलते हैं अपने लबों से

बात वही फिर फिर वो दोहरा रहे हैं।


भावना समझी गई ,अब तलक कद्र कर,

नहीं प्रतिकार कोई हमने किया,

सोच लो हाल ऐसा जब बिना प्रहार के,

क्या होगा हस्र उनका जो उकसा रहे हैं।


मैं ईश्वर का बालक, मेरा वही सहारा,

मैं स्वांस हूं प्रभु की, वो मेरा तारनहारा,

ये जीवन उसी से, है मृत्यु उसी से,

फिर वो भय के चुटकुले क्यों सुना रहे हैं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract