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अंकित शर्मा (आज़ाद)

Abstract Others

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अंकित शर्मा (आज़ाद)

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परवरदिगार

परवरदिगार

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मेरे टूटते ही सब

हिम्मत सार हो गए

मैं हुआ थोड़ा पागल

सब समझदार हो गए


मैं बेकरार घूमता था,

तब तल्ख निगाहें थीं,

मेरे फेरते ही नजरें,

सब बेकरार हो गए।


बड़े अनजान सब थे,

मुझसे अभी तक,

जो हम नदारद हुए 

सब राजदार हो गए।


मुझे शक की निगाहों से 

घेरने की ख्वाहिशें थीं

दिखाया जो आईना

तो शर्मशार हो गए।


मैं रोज पूछता था,

हाले दिल उन्हीं से,

जो हम चुप हुए,

वो परवरदिगार हो गए।




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