STORYMIRROR

Shailaja Pathak

Drama

4  

Shailaja Pathak

Drama

सुबह सबेरे

सुबह सबेरे

1 min
46

आंखों से सुना व कानों से

देखा करती हूं मैं रोज

कितनी ही प्राक्रतिक आवाजों को,


भाषाएं अलग अलग है

अभिव्यक्ति की,

फिर भी कुछ ना कुछ

कहते रहते हैं वो,


इसीलिए हर सबेरे आंखों से

सुनकर कानों से

देख़ती हूं मैं उन्हें।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama