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Shailaja Pathak

Abstract

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Shailaja Pathak

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मै नदी हूं

मै नदी हूं

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मै तो नदी ही हूं,

हाँ, नदी ही हूं मै,

बहती रहती हूं अपने दोनो किनारो के बीच, शांति से,

तृप्त करती हूं  सबको,

बिना किसी चाह के,

संतुलित, निरंतर,

कर्तव्य  परायण सी,

मेरेे किनारों पर कई सभ्यतआओ का जनम हुआ,

बरगद के सघन पेड़ पर  पक्षियों की तरह,

मै तो बहुत खुुश थीं कि तुम खुुश हो,

बहती भी इसलिए  चली जा रही थी कि,

खत्म कर दूँगी अपने अस्तित्व को,

और मिल जाऊंगी अपने सागर से,

पर तुम मुझेे छेड़ना मत,

यदि किनाारेे तोड़ कर बहनेे लगी तो,

उन्ही सभ्यताओं को नष्ट करने की क्षमता भी रखती हूं मै,

तुम भी जिओ मुझे भी जीने दो,

बहनेे दो बस मुुुझे - यूंही।



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