सर्वश्रेष्ठ रचना
सर्वश्रेष्ठ रचना
काम करते-करते, एक दिन
सृष्टिकर्ता जब उकताया,
सैर करने का पृथ्वी की
उसने अपना मन बनाया।
वाहन पर चढ़ अपने जब वह,
धरती पर उतर कर आया
राह में उसके सबसे पहले,
एक घना सा जंगल आया।
पशु, पक्षी और कीट, पतंगे
सब अपने आप में थे मदमस्त,
नहीं कहीं था कोई झगड़ा,
भेदभाव न थी नफरत।
जैसा सोचा था मन में
सब कुछ वैसा ही पाया,
अपनी इस रचना पर "रचनाकार"
मन ही मन मुस्काया
अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना का
ख्याल उसे जब आया
इंसानों की बस्ती में फिर
उसने अपना रथ घुमाया।
हाहाकार मचा था चहूं ओर,
छल-कपट और राहजनी थी,
भाई, भाई से लड़ता था,
संतुष्टि तो कहीं नहीं थी।
भेदभाव और ऊंच-नीच की
हर दिल में दीवार खड़ी थी,
कहीं कोई था भूख से रोता,
कहीं अन्न की कद्र नहीं थी।
दया प्रेम हर दिल से गायब,
मोह-माया ही वहां बसी थी,
इंसानों की इस बस्ती में,
इंसानियत ही कहीं नहीं थी।
एक तरफ देखा जो उसने
उसके ही कुछ घर बने थे
मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरु द्वारा
जैसे उनके नाम पड़े थे।
रहते थे कुछ लोग यहाँ जो
खुदा का बंदा खुद को कहलाते,
बनकर ठेकेदार धर्म के
मानव को मानव से लड़ाते।
मानवता के ये दुश्मन
क्यूं कर थे धर्म गुरु कहलाते,
मानवता ही धर्म बड़ा है,
जो खुद ही यह समझ न पाते।
अंधकार देखा हर दिल में,
सृजनाकर सकते में आया,
सर्वश्रेष्ठ समझा जिस कृति को
आज पशु से बदतर पाया।
आज पशु से बदतर पाया।
