सरहद की सर्दी
सरहद की सर्दी
अरे भाई आज तो बहुत ज्यादा ठंड पड़ रही,
स्वेटर, मफ़लर, जैकेट, कुछ भी काम नहीं कर रही,
मन नहीं कर रहा रजाई से बाहर निकलने का,
और जो बाहर जा रहा, उसकी तो जान पे बन रही।
तापमान गिरता जा रहा, दांत किटकिटा रहा,
ब्लोअर कोई चला रहा, अलाव कोई जला रहा।
कविता नहीं मैं कह रहा, भूमिका अपनी बना रहा,
समझोगे शायद आसानी से, जो अब कहने जा रहा।
देश की सीमाओं के जो पहरेदार हैं,
हमारी हौसला-अफजाई के वो सब हकदार हैं,
ठंड उन्हें भी लगती है पर जोश न उनका ठंडा होता,
देश पर मर मिटने की चाहत से लहू उनका उबलता,
इसीलिए तो सरहद पर इतनी गरमा-गर्मी रहती,
इस तरफ अगर सर्दी है,
उस तरफ भी तो है ठंड पड़ती।
हम ढांकते खुद को कंबल से,
वो बर्फीली चादर ओढ़ते,
दुश्मनों के दांत वो खट्टे करते,
हम चैन से मूंगफली फोड़ते।
वो सब देश-सेवा में लीन, कर रहे महायज्ञ हैं,
हम उन सबके आभारी, सभी के प्रति कृतज्ञ हैं।
