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Devendra Singh

Tragedy

4  

Devendra Singh

Tragedy

सियासत

सियासत

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दंभ का नाटक रचा कर क्या करोगे

पुतलियां जी भर नचा कर क्या करोगे


मर गया माझी तड़प कर भूख से ही

महज़ पतवारें बचा कर क्या करोगे


हो गयी नीलाम इज्जत महफिलों में

मान का हल्ला मचा कर क्या करोगे


खा गए राशन गरीबों  के घरों का

दाल रोटी को पचा कर क्या करोगे


लाज गिरबी रख सियासत में घुसे थे

शर्म से मस्तक लचा कर क्या करोगे


जम गईं परतें कवक की मन तलक में

धूप में खुद को तचा कर क्या करोगे।।


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