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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

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अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

मेरा ग़म

मेरा ग़म

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आखिर क्यों बार बार दिल उदास होता है,

 फ़िक्र नहीं उसी की याद में दिल रोता है..

दर्द इतना है ग़म ए आरज़ूओं का,

कोई दरिया बह जाए आंसुओं का..

हर सुबह एक रोज नया दौर ए मुकाम लाती है,

कल हारी शाम जिंदगी फिर सुबह जीत जाती है..

हिम्मत और हिमाकत जो नहीं करता है,

वो कभी दौर ए मुकाम नहीं होता है...

टूट जाता है दिल ज़ब उम्मीद नहीं रहती,

बस यूँ ही फिर जिंदगी ख़ुश नहीं रहती..

हार गया दिल उम्मीद ए वफ़ा करके,

वो नहीं समझें प्यार जफ़ा करके..

टूट जाए वो कड़ी जो दिल जोड़ती है,

बहुत दर्द होता दिल में और जिंदगी जीती है..



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