STORYMIRROR

अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

4  

अधिवक्ता संजीव रामपाल मिश्रा

Tragedy

मेरा ग़म

मेरा ग़म

1 min
350

नादान है मेरा दिल जो वफ़ा की उम्मीद रखता है,

नहीं समझता दिल जिंदगी की हर सांस बेवफ़ा है...

सुबह हुयी है,


 और गम का चिराग़ ज़ल रहा है,

अंधी मोहब्बत में रौशनी को ज़िन्दा दिल ज़ल रहा है...

दर्द का हद से बढ़ना,


कोई फिर दवा नहीं,

स्याह क़लम ए जज्बात, 

गम को चैन मिलता नहीं..

सिसकियाँ लेता है दिल,


इश्क़ की हर सांस कातिल,

बर्बाद कर देती है मोहब्बत,

मुस्कराता है बेज़ुबान इश्क़...


मेरी साँसो का वजूद,

अब धीरे धीरे खत्म हो रहा है...

बहुत नाजुक हो गए हालात,

वक़्त ए मिजाज़ जी रहा है..


कोई मेरे घायल दिल से पूंछे,

कि यह तीर कहाँ से लगा है...


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy