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Devendra Singh

Abstract

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Devendra Singh

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कलम चलदर्द लिख

कलम चलदर्द लिख

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कलम चल

लगा के दम चल

दर्द लिख

मेरा लिख

इसका लिख

जिसका दिखे

उसका लिख

कलम चल दर्द लिख


सूखा लिख

भूखा लिख

हारी लिख

बीमारी लिख

बिन दवा के लाल मरा

माता की लाचारी लिख

कलम चल दर्द लिख


खेत लिख

फसलें लिख

बिगड़ गयीं जो

नस्लें लिख

कृषकों की बर्बादी लिख

तड़प रही आबादी लिख

लोकतंत्र की बंदिश लिख

नेता की आज़ादी लिख

कलम चल दर्द लिख


खुले हुए मदिरालय लिख

बन्द पड़े विद्यालय लिख

अनपढ़ होती जनता लिख

धर्म ध्वजा को तनता लिख

दीना की मजबूरी लिख

मिलती नहीं मजूरी लिख

लिखने को तो बहुत पड़ा पर

है जो बात जरूरी लिख

कलम चल दर्द लिख


झूठा हर अश्वासन लिख

पांच किलो बस राशन लिख

मिलती रोज दिलाशा लिख

धूमिल होती आशा लिख

मंहगा होता खाना लिख

अच्छा कोई बहाना लिख

मरियल होता हंस देख ले

कौआ खाता दाना लिख

कलम चल दर्द लिख


धर्म भीड़ उन्मादी लिख

दंगा और फसादी लिख

जाति-पाति की दूरी लिख

शोषित की मजबूरी लिख

पीड़ित होती अबला लिख

झूठ लिखे तो सबला लिख

शांति व्यवस्था गायब है

सिर पे बजता तबला लिख

कलम चल दर्द लिख।


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