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Ajay Singla

Classics

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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत - ५५; विभिन्न गतिओं और भक्तियोग की उत्कृष्टता का वर्णन

श्रीमद्भागवत - ५५; विभिन्न गतिओं और भक्तियोग की उत्कृष्टता का वर्णन

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जो पुरुष घर में रहकर ही 

पालन करे गृहस्थ धर्मों का 

अर्थ, काम का उपभोग करे वो 

उन्ही का है अनुष्ठान वो करता|


कामनाओं से मोहित रहता वो 

भागवतधर्म से विमुख हो जाता 

देवता, पितरों की पूजा करता 

चन्दलोक में वो है जाता|


जब पुण्य क्षीण हो जाते 

फिर इसी लोक में लौट वो आता 

प्रलयकाल में सब लोक लीन हों 

प्रभु में वो भी लीन हो जाता|


जो पुरुष अपने धर्मों का 

उपयोग न करे भोग के लिए 

भगवान की प्रसन्नता के लिए ही 

धर्मों का अपने पालन वो करे|


सर्वथा शुद्ध चित्त हो जाये वो 

हरि को वो प्राप्त हो जाये 

अत: आप भी हे माता जी 

मन को हरि चरणों में लगाएं|


भगवान के प्रति भक्ति योग से 

वैराग्य, ज्ञान की प्राप्ति हो जाती 

सिर्फ भगवान का दर्शन हो तब 

पुरुष की तब मुक्ति हो जाती|


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