"श्री कृष्ण बाल हठधर्मिता"
"श्री कृष्ण बाल हठधर्मिता"
श्री कृष्ण भगवान जब छोटे बच्चे थे।
तब अपनी माताजी से रात्रि में चमकते हुए।
आकाश के चन्द्रमा को लाने कि जिद में रूठे।
माताजी के मनाने के अथक प्रयास विफल हो गये।
तब माताजी ने बर्तन के पानी में चन्द्रमा दिखाया।
श्री बाल कृष्ण ख़ुश होकर चन्द्रमा से खेलने लगे।
बाल हठ, त्रिया हठ, योग हठ।।
छोटे बच्चे चाकलेट हेतू रूष्ट हो रोने लगते हैं।
चाकलेट नहीं दिलाते तब रोते रूष्ट होते हैं।
चाकलेट दिलाते ही ख़ुश हो सदैव मुस्कुराते हैं।
हमें पता हैं कि छोटे बच्चे ईश्वर का रूप होते हैं।
राग द्वेष भेद-भाव से बच्चे कोसों दूर होते हैं।
जैसे जैसे बच्चे बड़े होते हैं सब लक्षण आते हैं।
कहीं बेहतर कहीं कमतर दोनों लक्षण आते हैं।
माता-पिता कि सेवा वाले श्रवण पुत्र होते हैं।
नालायक वृद्धाश्रम में डाल के ख़ुशी मनाते हैं।
कलयुग में भवसागर पार उतरते के लिए।
माता-पिता कि सेवा सबसे सुगम रास्ता हैं।
कवि देवा कहें, करोगे माता-पिता कि सेवा
तो सदैव पाओगे मैवा।।
