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शालिनी मोहन

Drama

4  

शालिनी मोहन

Drama

सड़कें

सड़कें

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सड़कें कितनी लावारिस होती हैं

बिल्कुल आवारा सी दिखती हैं।


बिछी रहती हैं, पसरी रहती हैं, चलती रहती हैं

कभी सीधी, कभी टेढ़ी-मेढ़ी तो कभी टूटी-फूटी

कहीं जाकर घूम जाती हैं, कहीं-कहीं पर 

जाकर तो बिल्कुल ख़त्म हो जाती हैं

चौराहे पर आपस में मिल जाती हैं सड़कें।


कौन होता है इन सड़कों का

कोई भी तो नहीं होता है 

कोई होता है क्या

रोज़ाना कुचली जाती हैं पैरों और गाड़ियों से 

देखती हैं कितने जुलूस, भीड़, आतंक।


सहती हैं खून-खराबा और कर्फ्यू

खाँसती हैं धुएँ में और खाँसते-खाँसते 

सड़कें बूढी हो जाती हैं, तपती हैं तेज़ धूप में

बारिश कर देती है पूरी तरह तरबतर

ठिठुरती हैं ठंड में और गुम हो जाती हैं कोहरे में।


सुबह से शाम, शाम से रात और फिर रात से सुबह

सड़कें होती हैं, अकेली, चुपचाप, ख़ामोश

सच तो यह है कि

यही सड़कें कितने ही बेघर लोगों का घर बन जाती हैं।


सड़कें कभी सुस्ताती नहीं

भीड़ में और भीड़ के बाद भी रहती हैं ये सड़कें।


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