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Abasaheb Mhaske

Tragedy Action Crime

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Abasaheb Mhaske

Tragedy Action Crime

सबकुछ तो तय हैं ...

सबकुछ तो तय हैं ...

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सबकुछ तो तय हैं, फिर किस बात का भय हैं ?

जन्म से लकीर खींची श्मशान तक

रोटी से लेकर उस चाँद तक भागते हो

आखिर इंसान तुम क्या चाहते हो ?


खुद पे इतना घमडं हैं या किसी द्विधा में हो ?

कहीं इंसान इंसानियत भुला तो नहीं

माना की भूख होना भी प्राकृतिक धरम हैं

मगर उतनाही चाय में शक्कर, खाने में नमक


इंसान - इंसान में इतना फर्क क्यों हैं भाई ?

एक रोटी के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं

दूसरा रोटी के बदले कुछ भी काम करवाता हैं

एक खून चूसता हैं दूसरा बहाता हैं क्यों इंसान ?


उन्हें भूख नहीं लगती इसलिए परेशांन हैं

यह भूक क्यों लगती हैं बार - बारे सोचते हैं

दुनिया भरके हर फसाद की जड़ भूख ही हैं

भूख लगे तो परेशान, ना लगे तो भी परेशान।


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