सौंदर्य गीतिका
सौंदर्य गीतिका
पूर्णिमा की निशा में है
सितारों की सी झटा।।
परम नील हेमांतरिक्ष मे
सुधांशु पय शुभ्रता।।
शंखजों की सी प्रभा है
केशराशि बीच में।।
श्वेत सुमन सुरंजिता है
रम्य काली वसन में।।
श्याम मुकुट शिखि पुंछ सम है
मृदु पुहुप सुमुग्धता।।
श्याम नीरद कांतिमयता
कनक लज्जत गात्र का।।।
कोमलांग कपोत जैसी
अंग भूषण लालसा '
कमलिनी कुल होड वैसी
वस्त्र की वर सज्जना।।।
निर्झरों की कलकल ज्यों
कंकणों की झन झन त्यों।।
निर्मल कुंडल वरमणि लस हों
नील रतन नूर यों।।
चारु किंकिणि शिथिलता व
कंधनी कल स्वर मुदा।।
चपल नूपुर धुनि सुनी व
पूत मन की मोहिता।।
