सावन की रुत
सावन की रुत
सावन की रुत आई है, मन में उमंग लाई है,
बादल ने घूँघट खोला, धरती आज शरमाई है।
बूँदों ने पायल की तरह, मधुर झंकार सुनाई है,
भीगी-भीगी पुरवाई, प्रेम की धुन मन भाई है।
कदंब तले झूले पड़ें, सखियाँ मधुर मुस्काई है,
कोयल की कुहूँ सुनकर, विरह की आग लगाई है।
चूड़ी खनके, मेहँदी महके, अधरों से मुस्काई है,
सावन के इस मधुमास ने, प्रेम ज्योत जलाई है।
नयनों में नील घटाएँ, अधरों पे मधुर कहानी है,
बूँद-बूँद में घुलती जाए, प्रीत पहचान करवाई है।
‘
मुरली’ के दिल में सावन ने, प्रेम सुधा बरसाई है,
शराबी शबनम दौड़कर आई, बांहों मेंं समाई है।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

