मन मारना
मन मारना
मन मारकर जीना भी अज़ब सी मजबूरी है,
हँसते हुए चेहरे में छिपी हुई आँखें अधूरी हैं।
अरमानों को दबाकर मुझे मुस्काना पड़ता है,
अपने ही सपनों को अब समझाना पड़ता है।
कभी हालातों से मन का समझौता होता है,
कभी अपनों की खातिर दिल छोटा होता है।
मन रोता है फिर भी होंठों पर हँसी रहती है,
खामोशियों में भी दिल की कहानी कहती है।
हर तमन्नाओं को यूँ ही मै कुचलता रहता हूंँ,
मन की आवाज़ को दबाना ठीक लगता नहीं।
‘मुरली’ मन को मारना मे जीना नहीं चाहता,
मन को समझकर जीने में सुख खो पाना है।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
(साहित्यकार एवम् शास्त्रिय संगीतकार)
