उपद्रव
उपद्रव
शांति छीनकर यह ज़िंदगी को बेहाल करता है,
यह छोटा-सा उपद्रव बड़ा भारी बवाल करता है।
इंसान जहाँ सजाता है सपनों का सुंदर चमन,
वहाँ आकर यह सब कुछ तहस-नहस करता है।
धैर्य की दीवार तोड़कर यह हद पार कर जाता है,
छोटी-सी बात में भी बड़ा तूफ़ान खड़ा करता है।
खुशी के जो चंद लम्हे हम सहेज कर रखते हैं,
एक पल में आकर यह उन्हें वीरान कर देता है।
छोड़ दे राग-द्वेष और अब प्रेम की ज्योत जला,
‘मुरली’, प्रेम के बिना यह संसार बस उपद्रव ही करता है।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ूनागढ-गुजरात)
