गत्वर
गत्वर
तेरी याद की महक अब भी हवाओं में रही,
वक़्त गुज़रता ही गया, मगर ये दिल में रही।
कल की तस्वीरों में, चेहरे हँसते हुए मिल गए,
आँख नम रही, पर होंठों पे फिर भी हँसी रही।
जो कभी तुम मेरी थी, आज अजनबी हो गई,
दूरियाँ बढ़ती रहीं, दिल में वही नज़दीक़ी रही।
वक़्त ने बदले कई मौसम और कई रिश्ते मगर,
एक तेरी याद थी जो हर घड़ी मन में ताज़ा रही।
कुछ अधूरी ख़्वाहिशें सोई हुई हैं मन के बीच,
ज़िंदगी चलती रही, इश़्क की प्यास अधूरी रही।
कल तुझे पाने की ख़ातिर उम्र सारी दे दी थी,
आज तेरी याद ही बस ज़िंदगी की रोशनी रही।
अब तो बीते वक़्त को लौटाना मुमकिन तो नहीं,
पर तेरी हर एक धुन मेरे दिल में सदा ज़िंदा रही।
गुज़र जाता है समय, इंसान भी बदला मुरली",
सच्ची चाहत की मौसम उम्र भर लहराती रही।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली "(ज़ूनागढ-गुजरात)

