चाँद का मुखड़ा
चाँद का मुखड़ा
चाँद का मुखड़ा देखा, दिल मेरा ठहर गया,
रात का सूना गगन आज जैसे निखर गया।
उसकी आँखों की चमक में अजब जादू था,
देखते ही देखते हर ख़्वाब मेरा संवर गया।
चाँदनी उसके लबों की मुस्कुराहट बन गई,
देखकर वो रूप सारा मन मेरा बिखर गया।
उसके रुख़सारों पे जब चाँदनी ठहरी ज़रा,
चाँद का चेहरा भी शायद शर्म से उतर गया।
एक पल उसकी नज़र पड़ गई मुझ पर यहाँ,
दिल में बरसों से छुपा एहसास भी उभर गया।
काग़ज़ पर बनाया चाँद का वो मुखड़ा मैंने,
हर नया मिसरा उसी के नाम पर गुज़र गया।
"मुरली" उस हुस्न की क्या दास्ताँ लिखूं मैं,
नाम उसका लिखकर दिल मेरा संवर गया।
रचना :-धनजीभाई गढिया"मुरली" (ज़ूनागढ-गुजरात)

