पारिजात
पारिजात
रात भर तारों से छनकर बिखर जाता है कौन,
पारिजातुल-हिन्द बनकर अब महकता है कौन।
टोरते ही फूल मुरझा जाए दुनिया के मगर,
डालियों से दूर होकर भी महकता है कौन।
स्वर्ग से उतरी कहानी है पुरानी यह बहुत,
पारिजात की छांव में अब चैन पाता है कौन।
रंग केसरिया बदन पर और श्वेतों का शृंगार,
रात के सन्नाटों में आके संवरता है कौन।
पारिजात के पौधे से सीख लो तुम भी हुनर,
दर्द सहकर भी जमाने को हंसाता है कौन।
भोर होते ही जमीन पर फूल गिर जाते सभी,
रातभर इस पेड़ से चुपचाप लिपटता है कौन।
पारिजात की खुशबू से महक उठा है आंगन,
इस नगर में आज चुपके से सिधारता है कौन।
"मुरली" कह रहा है, यह राज सुन ले तू जरा,
पारिजात के फूल बनकर आज बिकता है कौन।
रचना:-धनजीभाई गढिया"मुरली" (ज़ूनागढ-गुजरात)
