कलियुग की परिभाषा
कलियुग की परिभाषा
ईमान का अब हर तरफ़ व्यापार हो गया है,
रिश्तों में भी मतलब का व्यवहार हो गया है।
सच बोलने वाला यहाँ लाचार हो गया है,
झूठा मगर समाज में हक़दार हो गया है।
धनवान के आगे सभी सिर झुकने लगे हैं,
निर्धन का इस जहाँ में बहिष्कार हो गया है।
माँ-बाप की सेवा भी अब भार हो गई है,
औलाद के लिए धन ही संसार हो गया है।
ज्ञान बिक रहा है यहाँ बाज़ार की तरह से,
शिक्षा का भी अब देखो व्यापार हो गया है।
न्याय की राह में भी सिक्कों की चाल देखो,
सच्चा खड़ा अदालत में बीमार हो गया है।
"मुरली" ये कैसा युग है, इंसानियत कहाँ है?
इंसान तो है लेकिन दिलदार हो गया है।
रचना :-धनजीभाई गढिया"मुरली" (ज़ूनागढ-गुजरात)
