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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Inspirational Thriller

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Dhanjibhai gadhiya "murali"

Inspirational Thriller

अति के बाद क्षति

अति के बाद क्षति

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हद से आगे जो बढ़ा, बर्बाद होना तय हुआ,
अति के आगे इस जहाँ में, क्षति पिरोना तय हुआ। ​

नाज़ था जिसको बहुत अपनी बुलंदी पर कभी,
उसका इक दिन मिट्टी में आख़िर समाना तय हुआ।

सींच कर ख़्वाहिश को नफ़रत से उगाने वाले सुन,
जो बोया तूने वही फल काट कर खाना तय हुआ। ​

फूल भी मुरझा गए जब धूप बे-अंदाज़ा थी,
हर ज़्यादती के बाद ग़म का बीज बोना तय हुआ।

साँस की भी एक सीमा तय करी है रब्ब ने,
हर अकड़ का अंत में ख़ामोश होना तय हुआ।

"मुरली" ​लिख रहा हूंँ सच इस दौर की तासीर का,
ज़ुल्म की जब अति हुई, तब अंत होना तय हुआ।

 रचना:-धनजीभाई गढिया"मुरली" (ज़ूनागढ-गुजरात)


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