ध्वनि
ध्वनि
सुनाई पड़ी जब मुझको तेरे पाँव की ध्वनि,
सज-सँवर सी गई मेरे मन के भाव की ध्वनि।
तेरे मुस्कुराने से खिल गई है दिल में चाँदनी,
रवाँ है रग-ब-रग में एक भीगी रागिनी-ध्वनि।
झुकी पलकों से जब तूने बुना इक रेशमी जादू,
लगी दिल को छूने वो अतिशय मोहिनी-ध्वनि।
सजे केशों में जूही, और हाथों में कंगन छनके,
उठी फिर रूप की सरगम, खिली कामिनी-ध्वनि।
तेरे आने से दूर हुआ है मेरा जुदाई का ग़म,
दीपक बन के चमकी है नज़र की रोशनी-ध्वनि।
तुझे देखा तो मेरे इश्क़ में लहराने लगी बसंत,
मदहोश बना गई तेरे बेशुमार हुस्न की ध्वनि।
तन्हा मेरे मन में तेरी यादों का खिल गया मौसम,
"मुरली" में तुझे सुनाऊँगा इश्क़ के राग की ध्वनि।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" मुरली"(ज़ूनागढ-गुजरात)

