कान्हा के रंग में रंगा मेरो मन
कान्हा के रंग में रंगा मेरो मन
कान्हा के रंग में रंगा मेरा मन,
त्याग दिया जग का सब बंधन।
साँवली सुरत बसी इन आँखों में,
हर पल अब तो होता सुमिरन।
अधर धरते ही मधुर तान छिड़ी,
तृप्त हुआ राधाजी का तन मन।
गोकुल की गलियों का मैं रज हूँ,
माखनचोर पर न्यौछावर यह तन।
प्रेम की धारा बहती है अविरल,
जीवन बीतने लगा है अब सरल।
बंसी की धुनों पर झूम उठे सब,
कान्हा ही जीवन, कान्हा ही शरण।
"मुरली" कान्हा के चरणों समर्पित,
पा लिया मैंने भक्ति का पावन धन।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)
