सावन बीता जाए
सावन बीता जाए
सावन बीता जाए, मन फिर भी तरसता रह जाए,
भीगी-भीगी यादों में सनम का चेहरा नज़र आए।
बादल तो बरस गए, मगर दिल तो रह जाए प्यासा,
आँखों का नीर चुपके से पलकों पर ही ठहर जाए।
मन मेरा मायूस है, इंतज़ार करता रहा है सनम का,
उसकी आहट सुनते ही दिल की धड़कन बढ जाए।
भँवरें गुन गुन कर रहे है, कोयल सुना रही तराना,
सनम के मधुर मिलन बीना सावन मन को न भाए।
बिजली चमक रही है, बादल भी गरज रहे घनघोर,
तन्हाई के आँगन में फिर विरह अति अगन लगाए।
मौसम तो अब बदल गया है, पर बदला नहीं ये मन,
हर बूंद में बीते हुए लम्हों की याद से मन तड़प जाए।
‘मुरली’ मधुर धुन बजाकर, सनम को पुकार लगाए,
सनम तो अब तक नही आई, दिल को कैसे बहलाए।
रचना:-धनजीभाई गढीया"मुरली" (ज़ुनागढ-गुजरात)

