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नीलम पारीक

Drama

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नीलम पारीक

Drama

रिश्तों के बीज

रिश्तों के बीज

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देखो

खिल उठी धुप

फैले हैं छतों पर

अनाज, दालें,

प्लास्टिक की रस्सी पर

फैली हैं चादरें


ऐसे ही 

रिश्तों को भी दें

थोड़ी धूप विश्वास की

छंट जाए भ्रम का कोहरा

चमके आस का सूरज


और हो जाए अंत

शक़ की इल्लियों

और गलतफहमियों के घुन का

नोक झोंक की छाज में

छान फटक कर


निकाल शंकाओं का कचरा

फिर से बोएं दिल की धरा पर

रिश्तों के बीज

सींचे प्रेम जल से

निहारे पल पल अंकुरित होना


बढ़ना, फैलना

और बन जाना इक दिन

दिल के आँगन में

रिश्तों का नंदन कानन।


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