राह बिना मंज़िल के
राह बिना मंज़िल के
जिसकी कोई मंजिल नहीं, उसी राह पर क्यों चले,
ज़िन्दगी सूखाने वाली धूप से तपी रेत पर पाँव है जले।
पर फिर भी रूह चाहे राहत को,
काँटे चुभने पर भी चुने रहें चाहत को।
मुझसे जानो, कैसे जिएँ सीने में बिना दिल के,
ये कैसी राह बिना मंज़िल के ?
हाथ पकड़ चलने का वादा सिर्फ करना नहीं था,
पर मिलते ही मुझे ज़मीं पर छोड़ फलक में फिरना नहीं था।
मैं नहीं पुकारती अब, गला सूख गया है,
मुझे तर करने वाला बदल सूख गया है।
अब तो आदत हो गई, जीने की, दिल के कतरे-कतरे सिल के,
ये कैसी राह बिना मंज़िल के ?
जब चाहत सूरज की जगी है,
काली हर एक रोशनी लगी है।
पर मुझे क्या पता था, बदले में मेरी चाहत के,
वो सूरज सुखा देगा अंकुरों को मेरी राहत के।
पर फिर भी जलती हूँ उस सूरज की लपटों में ही मिल के,
ये कैसी राह बिना मंज़िल के ?
मैं एक बुझी मशाल हूँ,
बेज़ुबां मचलते दिल का हाल हूँ।
जिसे किसी ने आज तक सुना नहीं,
या फिर किसीने सुनना चाहा ही नहीं।
और चाहत की खुशी छिपी बैठी है कोने में किसी बिल के,
ये कैसी राह बिना मंज़िल के ?

