STORYMIRROR

Prerna Rastogi

Tragedy

4  

Prerna Rastogi

Tragedy

पशुओं की करुण पुकार

पशुओं की करुण पुकार

1 min
655


पशु हैं करते यही पुकार

हमारे अस्तित्व से ना करो खिलवाड़

क्यों अनदेखा हमें किया है जाता

जीने का हक नहीं है मिलता

प्रकृति पर है अधिकार हमारा

जीने का यह एकमात्र सहारा

नहीं मांगते धन और दौलत

ना चांदी जायदाद व सोना

हम तो मांगे इस धरती पर

अपने लिए छोटा सा कोना

दूध दही के हम हैं दाता

जीवन सफल हमसे हो पाता

बोझा ढोते हैं हम सबका

भोजन मिले ना फिर भी ढंका

बूढ़े होने पर सब हमको

सड़कों पर है छोड़ के जाते

जिस घर का हम खाते निवाला

वही की वफादारी का प्रण है पाला

हित और स्वाद की खातिर ही तो

हमारी कुर्बानी दी है जाती

हम बेजुबान जानवरों पर तो

अत्याचारों की लड़ी लगाई जाती

हमको भी दुख दर्द है होता

दिल यह हमारा भी है रोता

हम भी हैं इस धरा के वासी 

मांगे बस थोड़ा सा प्यार

हे मानव तुम सहज भाव से

धरा पे दो जीने का अधिकार

हमारा संरक्षण जरूरी है धरा हम से ही पूरी है।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy