प्रतिछाया
प्रतिछाया
निनिर्मेष उसको देखा मैंने
सांसे जैसे अटक गई
हूं-ब-हूं वो मेरे प्रीतम जैसी, यकीन न होता मुझको कभी।।
यादों में जिसकी खोया रहता
दूरी, सहन जिससे होती नहीं
हर जगह जैसे दिखने लगी वो, काल्पनिक लगता सब जैसे ख़्वाब कोई।।
मेरी नीयत, सीरत मैं कुछ नहीं जानूँ
कोई गलत विचार मेरे मन में नहीं
संगिनी, बहन उसे कह नहीं सकता, है अंजान/अजीब सा उससे रिश्ता कोई।।
सुद-बुध अपनी खो बैठता
जब-जब उसको देखूँ कहीं
जैसे मन-मंदिर से मेरे निकल के आई, सम्मुख मेरी प्रीतम मेरी संगिनी अभी।।
शुक्रिया कहता उस ईश्वर का
जैसे पूरी कर दी उसने आस कोई
मेरी दुनिया जिसने बनाई, आज देखूं उसको हर जगह हर ओर कहीं।।

