'प्रेम' और 'जाति' भाग-१
'प्रेम' और 'जाति' भाग-१
संस्कारों के आड़ में,
खुद को रोक रखी थी वो,
प्रेम तो उसे भी था उससे,
फिर भी सोच रही थी वो !
दिल बार-बार कहता घरवाले नहीं मानेंगे,
निचली जाति का है वो,
पर जब-जब वो पास होता,
खुद को पूर्ण पाती थी वो !
पग-पग पर प्रेम की सीख,
देने वाली इस समाज की,
सीने में दबी जाति की,
जहर से डर जाती थी वो !
हिम्मत करके उसने उस लड़के को,
'हाँ' कर जिंदगी अब उसके नाम कर दी,
उसके प्रेम में भी माँ के समान चिंता थी,
पिता के सामान महसूस करती सुरक्षा थी !
जाति का प्रेम से,
दूर-दूर तक कोई नाता ना,
वो इंसान ही था जिसे जैसे उन्हें,
वैसे उसे भी कुदरत नहीं बनाया था !
समय बीता और विवाह बंधन,
का समय समीप आया,
निचली जाति का है लड़का,
जान घर वालों के मन-मस्तिष्क पर-
पूर्व से छाया जाति का,
काला घना कोहरा प्रबल हो आया,
मम्मी-पापा, मामा-मामी सबने,
मिलकर उसे समझाया-
'वो हमारे बराबर का नहीं !'
नीच जाति का है वो इसलिए,
उसे छोटी सोच वाला बतलाया,
होगी बदनामी समाज में,
क्या कहेंगे लोग पापा ने उसे समझाया !
बंद कमरे में बैठ बस रोती,
वो तो बस पूछती खुद से,
मुझे इस दुनिया में मेरे अपनों ने,
या इस समाज ने लाया।
